Love yourself in real life, / Rishta ka chakravyuh

  • Love yourself in real life,
Love yourself in real life, / Rishta ka chakravyuh
यह संसार जरूरत नियमों  पर चलता है

सर्दियों में जिस सूरज का इंतजार रहता है
उसी सूरज का गर्मी में तिरस्कार भी होता है

हर एक रिश्ता चाहात और नजरिया होता है
जिससे इच्छा पूरा होने से खत्म हो जाता है

अकोले चलो ने  वाले लोग घमंडी नहीं होता
अ दरअसल हर काम में अकेले काफी होते हैं

सनमान हमेशा समय और स्थिति का होता है पर इंसान उससे अपना समझ लेता है

पतझड़ भी हिस्सा है के मौसम का फर्क सिर्फ इतना है कुदरत ने पत्ते सूखते है और हकीकत में रिश्ता

इज्जत किसी इंसान की नहीं होता जरूरत की होती है जरूरत खत्म इज्जत खत्म यही दुनिया का सच है

  • Rishta ka chakravyuh

Love yourself in real life, / Rishta ka chakravyuh

एक लड़का का कहनी है, ईसका उम्र 5 साल था तब उस लड़का ने अपने आप से नहीं मम्मी और पापा से यार करता था,और उन्हीं को अपना हीरो मानता था।
  • जब उस लड़का का उम्र 18 साल हुआ तो अपने आप को प्यार करने लगा‌, और अपने आप को हीरो समझने लगा
  • उसी लड़का ने शादी किया और अपने आप को भुला कर अपना पत्नी के जिंदगी और प्यार करने लगा।
  • आव उसका एक लड़का हुआ तो सब कुछ बुलाकर अपना जिंदगी और प्यार करने लगा।
  • फिर कुछ साल के बाद बुढ़ापा आ गया तब अपना आपको और पत्नी और बेटा के छोड़ के भगवान के सब कुछ समझ लिया/जैसे हीरो, लाइफ, जिंदगी।?

मेरी आँखें न जाने क्यों कुछ ऐसा खोज लेती है,जो मेरे मन को सोचने पर मजबूर देती है कि आखिर जीवन कितनी बार स्वयं को दोहराता है। सबकुछ बदल रहा है लेकिन फिर भी कुछ नही बदल रहा क्योंकि घटनाएं तो वही होती है हर बार, बस करने वाला इंसान बदल जाता है।

हमने जिन फूलों को बहारों में खिलते हुए देखा तो पतझड़ के आते ही एक बेजान पेड़ को सांसे भरते भी देखा है। कभी-कभी अपनी ही सांसे कितनी बोझिल लगने लगती है, जिंदगी का ये पड़ाव जहां इंसान ठहरना तो नही चाहता लेकिन आगे बढ़ना भी उसके हाथ में नही होता।

एक ऐसा इंसान जिसने एक मजबूत साम्राज्य की नींव रखी हो,उसके बूढ़े हाथ इतने कमजोर हो जाते है कि वो स्वयं को भी नही सम्भाल सकता। इसी तरह एक बूढ़े शेर को उसके ग्रुप से बाहर निकाल देते है जो अब शिकार करने में समर्थ नही होता।

कुछ लोग समय रहते ही इस समय की शक्ति को महसूस कर लेते है और एक नम्र और आदर्श जीवन जीते है पर कुछ लोग तो बस आंखों पर पट्टी बांधकर जीवन जीते है और फिर बार -बार भावनात्मक ठोकर खाते है।

आज मुझे महसूस हो रहा है कि जीवन आंखों के सामने से कितनी बार गुजर रहा है और बस इसी रास्ते से मैं भी गुजर रही हूं और वही पहुँच जाऊंगी जहां मेरे अपने आज खड़े है। बचपन का वो दौर जहां मेरे नाना -नानी मेरे लिए दुनियाँ के सबसे मजबूत हाथ थे, जिनके लिए कुछ भी पाना या करना बहुत आसान था फिर जैसे -जैसे समय आगे बढ़ा तो ये मजबूत हाथ मेरे मामाजी के थे और उनकी उपलब्धियों ने उनको एक बड़ा स्थान भी दिया। उनकी एक नजर में हम समझ जाते थे कि अब हमको क्या करना है, उनकी किसी भी बात को टालना घर के किसी भी सदस्य के लिए सम्भव ही नही था। उनकी कही हर बात पत्थर की लकीर थी हम सबके लिए लेकिन इस बार उनको इतना बदला हुआ देखा कि मेरे लिए तो वो दूसरे ही इंसान बन गए। इस तरह आज मेरे भाई उंस जगह खड़े दिखाई दिए, जहां कल मामाजी और नानाजी खड़े थे।

जीवन अपनी गति से चलता रहता है और वही कहानी बार -बार दोहराता रहता है।बस नानी की वो भींगी हुई कमजोर आंखें देखकर मन दुख जाता है कि कल तक जो हाथ मेरे लिए सहारा थे आज वो इतने कमजोर कैसे, वो आंखें इतनी थकी और बुझी हुई क्यों?

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