अखंड भारत के लिए आचार्य चाणक्य की प्रतिज्ञा, चाणक्य की सीख

 

अखंड भारत के लिए आचार्य चाणक्य की प्रतिज्ञा, चाणक्य की सीख
चाणक्य की सीख

प्राप्त:काल होते ही वह मगध राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र जाने का विचार करने लगे। फिर वहां जाने के लिए निकल पड़े। दोपहर के समय पाटलिपुत्र पहुंचे। वहां उनकी भेंट एक बुढे़ ब्राह्मण से हुई,जव उन्होंने देखा कि वह नंद से मिलने जा रहा है तो उसने चाणक्य को समझाते हुए कहा-

तुम वापस तक्षशिला लौट जाओ।"
किया तुम मुझे बता सकते हो की शकटार और सेनापति मौर्य का क्या हुआ? चाणक्य ने पूछा लेकिन तुम हो कौन, मैं ब्राह्मण चणी का पुत्र हुं , मेरा नाम चाणक्य है। उसने उत्तर दिया। तब तो मैं तुम्हारे किसी सवाल का जवाब नहीं दे सकता।

चाणक्य सोच रहे थे की अगर महाराज की विलासिता का यही हाल रहा तो मगध अपने अस्तित्व की रक्षा कैसे कर पाएगा। तभी उनके कानों में स्वर सुनाई पड़ा-राजाधिरज मगध सम्राट महाराज नन्ढ ने पूछा --तुम हमारे राज्याश्रित छात्रवृत्ति प्राप्त चणी के पुत्र विष्णुगुप्त हो। मेरा नाम चाणक्य भी है। चाणक्य ने गम्भीर रहते हुए बताया। तुम हमसे क्या चाहते हो? उसके तेवर देखकर नंद गम्भीर हुआ। मैं आपको यह बताना चाहता हूं कि विदेशी आक्रमणकारियों की सेना पर्वतमाला तक पहुंच चुकी है! अगर अन्य राज्यओं की हार हुई तो विदेशी सेना मगध पर भी चढ़ाई कर सकती है। फिर मगध का किया होगा महाराज ? चाणक्य ने बताया। उसने एक बड़ा और गुढ़ प्रश्न नन्द के सामने रख दिया था।


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