चाणक्य नीति [ अध्याय 1] Chanakya niti in Hindi | first chapter

 जिनका उपयोग नहीं उनका होना क्या

एसे गै क्या क्या जाए (क्या लाभ), जो न दूध दे और ना ही गर्भ धारण करें, इसी प्रकार पैदा हुआ उस पुत्र से क्या प्रयोजन, (लाभ), जो न बुद्धिमान हो और ना ही भक्ति करता हो।


ईनसे सुख मिलता है

संसार के त्रिविध तोपों उसे तप्त मानवों के लिए तीन शान्ति के साधन है-  बुद्धिमान और धार्मिक पुत्र, सतीसाध्वी, (पतिव्रता स्त्री और) उत्तम पुरुषों की संगति।

चाणक्य नीति [ अध्याय 1] Chanakya neti in Hindi | first chapter

ये बातें एक बार ही होती है

राजा लोग एक ही बार आदेश देते हैं, पण्डितगण, विद्वान लोग भी एक बार बोलते हैं, कन्याएं एक ही बार दी जाती है (अर्थात् कन्यादान एक ही बार होता है ) ये तीनों बातें एक बार ही होती है। बातें एक बार ही होती है


कब अकेले कब साथ रहे

तप अकेले से होता है, पढ़ना, अध्ययन दो से होता है, गाना तीन से होता है, यात्रा चार के द्वारा ठीक प्रकार से होती है, खेती पांच से भली-भांति होती है, और युद्ध बहुतों के द्वारा होता है।


पतिव्रता ही पत्नी है

पत्नी वही है जो अन्दर और बाहर से पवित्र हो, जो कर्म करने में कुशल और अत्यन्त चतुर है। वही पत्नी उत्तम है, जो पतिव्रता है। वही पत्नी श्रेष्ठ है, जिसे पति प्रेम करता है अथवा जो पति से प्रेम रखती है, वस्तुत: वही पत्नी है जो सत्य वचन है!


निर्धनता अभीशाप है

पुत्ररहित पुरुष का घर सुना है। बन्धु- बान्धवों से रहित पुरुष के लिए दिशाएं सुन्य है, मूर्ख पुरुष का ह्रदय सुना होता है और दरिद्र पुरुष के लिए तो घर, दिशा आदि सब कुछ सुना होता है


ज्ञान का अभ्यास भी करें

बिना अभ्यास के शास्त्र विष है , अजीर्ण में, (भोजन के ठीक प्रकार से बचे बिना भोजन करना ) विष के समान हानिकारक है, दरिद्र के लिए सभा विष के भाती है और वृद्धपुरुष बूढ़े व्यक्ति के लिए स्त्री विष है।


इनको त्याग देना ही अच्छा

मनुष्य के चाहिए की वह दयारहित धर्म के छोड़ दे, विद्या हिना गुरु का त्याग कर दे, सदैव क्रोध करने वाली पत्नी का त्याग करें और स्नेहरहित वन्धु- वान्धवों को भी त्याग दे।


बुढ़ापे के लक्षण

मनुष्य के लिए बहुत अधिक पैदल चलना सीघ्र वृद्धावस्था लाने वाला है। घोड़ों के लिए बन्धन, उन्हें बांधकर रखना वृद्धावस्था लाने वाला है। स्त्रियों के लिए असम्भोग (मैथुन न करना ) वृद्धावस्था का कारण है और वस्त्रों के लिए धूप जारा है। उन्हें शीध्र जीर्ण- शीर्ण करने वाली है।


काम से पहले विचार कर लें

कौन-सा अथवा कैसा काल, समय है, कौन- कौन मेरे मित्र है, कौन सा देश, स्थान है, क्या मेरा व्यय और आय है तथा मैं कौन हूं और मेरी शक्ति क्या है-बार-बार इस प्रकार से सोचना -विचारना चाहिए, मानन और निदिध्यासन करना चाहिए।


अतिथि का महत्व

 ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का गुरु अग्नि तथा ब्राह्मण आदि चारों वर्णों का गुरु ब्राह्मण होता है। स्त्रियों का गुरु पति भी है, और अतिथि सबका गुरु है


स्पष्टवादी बनें

अधिकारी आकांक्षा-रहित, (निर्लोभ) नहीं होता अर्थात् अधिकार पाकर निर्लोभ होना मुश्किल है, श्रृंगार का प्रेमी आ काम नहीं होता अर्थात वह अवश्य ही कामुक होता है, चातुर्यहीन व्यक्ति अविद्वान् प्रिया और मधुर वचन नहीं बोलता, (मधुरभाषी नहीं होता) और स्पष्ट कहने वाला कभी धोखा बाज नहीं होता ।







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