हाड़ी रानी का इतिहास । hadi rani history in hindi

जिस समय भारत पर औरंगजेब का राज था, उस समय रूप नगर की राजकुमारी रूपवती की खूबसूरती के चर्चे फैला हुए थे। औरंगजेब उसे पाने के लिए व्याकुल हो उठे। रूपवती परेशान हो गई कि एक यवन राजा उस पर गलत नजर डाले, यह उसके लिए शर्म की बात होगी। अतः उसने उदयपुर के महाराणा राज सिंह के पास पत्र भेजकर विनती की कि वह अपने मन मैं उनको वर मान चुकी है और औरंगजेब उसको अपने पास रखना चाहता है। यह पढ़कर राजा अपनी सेना लेकर औरंगजेब से लड़ने के लिए बेचैन हो गए।

हाड़ी रानी का इतिहास । hadi rani history in hindi

राजा के सरदार चूड़ावत उन्हें उत्साह दिला रहा था कि उन्हें रूपनगर की राजकुमारी का मान अवश्य रखना चाहिए, परंतु समस्या यह थी कि राणा राज सिंह के पास सेना की कमी थी। जबकि औरंगजेब के पास सेना का जबरदस्त जमावड़ा था। ऐसे में तो उनकी हार तय थी और औरंगजेब इन्हें जीतकर या तो रूपवती को अपने साथ ले जाएगा या फिर वह उससे बचने के लिए मृत्यु को गले लगा लेगी ।

सरदार चूड़ावत पर राणा बहुत विश्वास करते थे और उसकी बहादुरी से भी संतुष्ट थे। सरदार चूड़ावत का विवाह चार दिन पहले ही हुआ था। उनकी पत्नी बूंदी के हाड़ावंश की राजकुमारी थी। दोनों बहुत छोटी उम्र के थे। सरदार चूड़ावत की उम्र विवाह के समय बीस बर्ष थी। अपनी पत्नी का मुंह तक उन्होंने नहीं देखा था।

औरंगजेब रूपनगर की राजकुमारी को पाने के लिए कूच करने की तैयारी में था। इधर राणा राज सिंह उसकी विशाल सेना से टकराने का मन बना चुका थे। उन्होंने सोचा कि रूपनगर को बचाना उनका कर्तव्य है। सरदार
चूड़ावत ने राणा को सलाह दी कि आप थोड़ी सेना लेकर रूपनगर की राजकुमारी से विवाह करने के लिए कूच कर दें। औरंगजेब को मैं युद्ध में मैदान में ललकार कर उतने समय तक उलझाए रख सकता हूं, जब तक आप रूपवती से विवाह न कर लें। यह योजना सभी को ठीक लगी और इस पर अमल किया जाने लगा।

शत्रु बहुत शक्तिशाली है, यह तो सभी जानते थे, फिर भी उसी तरह की योजना बनाई गई। सरदार जानते थे कि मुट्ठी भर सेना का शत्रु की विशाल सेना के सामने ज्यादा समय तक ठीक पाना कठिन है और सरदार की ही हार तय है, फिर या तो बंदी बना लिया जाएगा या फिर दुश्मनों के हाथों मारा जाएगा। दोनों तरह से उसका अपनी रानी से मिलन नहीं हो पाएगा।

कूच करने से पहले सरदार ने मन में अपनी पत्नी से मिलने का विचार बनाया। उन्होंने सोचा कि युद्ध के बाद पत्नी से मिलना मुश्किल-सा है, अतः जाने से पहले वह अपनी पत्नी का दीदार करने के बेचैन हो गए। उन्होंने रानी से मिलने का इच्छा जताई और उनसे मिलने पहुंचे

जब सरदार चूड़ावत ने रानी को बताया कि वह तुम उनसे मिलने के मोह को छोड़ नहीं पाए और इसी कारण आए हैं, तो हाड़ी रानी ने बड़े मीठे स्वर में उनसे कहा कि उन जैसे वीर को इस प्रकार से अपने हृदय को कमजोर करना शोभा नहीं देता है। वह एक वीर योद्धा है और वीरों का पहला कर्तव्य अपनी  मातृभूमि की रक्षा करना होता है। ऐसे समय में मोह शोभा नहीं देता। इस समय तो उन्हें वीर भाव को ही मान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि संसार में यदि कोई वस्तू सर्वोपरि है, तो वह अपने कर्तव्य का पालन करना।  आप विजयी होकर लौटेंगे, मेरी शुभकामना है। उस समय मैं थाल लेकर आपका स्वागत करने के लिए आपसे यहीं मिलूंगी। यदि आप युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए, तो मैं जौहर करके सती हो जाऊंगी और उस हाल में मैं आपसे स्वर्ग में मिलूंगी।

रानी के ये वचन सुनकर सरदार के मन में भी वीरता की भावना जाग्रत हुई और वह गहरे उत्साह से रानी से विदा लेकर चले, लेकिन कहीं ना कहीं वाह रानी के मोह में फंसे थे। इसलिए बार-बार मुड़- मुड़ कर रानी को देखते जा रहे थे। रानी भी अपने पति को जाते हुए देख कर भविष्य की आशंका से भरी थी, फिर भी अपना संतुलन नहीं हो रही थी।वह बराबर सरदार को प्रेरित कर रही थी तथा उनमें जोश भर रही थी।


सरदार चूड़ावत ने हाड़ी रानी से कहा, यदि मैं वीरगति को प्राप्त हो जाऊं, तो तुम भी अपना जीवन समाप्त कर लेना, फिर हम लोग स्वर्ग में मिलेंगे। देखो रानी, मुझे भूल मत जाना।

रानी अपने पति के इस प्रेम को देखकर चकित थी। उसने फिर भी अपने पति को समझाया, इस समय रणभेरी बज उठी है। तुम बेकार ही प्रेम को वशीभूत होकर मेरा ध्यान कर रहे हो। इस प्रकार तो युद्ध में तुम्हारा मन नहीं लगेगा, फिर तुम किस तरह वीरता से युद्ध कर पाओगे। हे स्वामी मेरा ध्यान मन से निकालकर अपने लक्ष्य की और बड़िए

रानी से इस प्रकार के वचन सुनकर उनके दिल पर प्रभाव हुआ और वह अपनी सेना की और चल दिए । जाते जाते भी वह रानी के मोह में पड़े थे। इन्होंने अपने एक विशेष सैनिक के हाथ रानी को एक पत्र भेजा, जिसमें जोर डाला था कि वह अपनी कोई निशानी सरदार के पास भेज दें, जिससे सरदार अपने कर्तव्य से न हटे और उन्हें रानी की जोश से भरी वाणी याद रहे। तभी वह साहस के साथ युद्ध कर पाएंगे।

सैनिक जब सरदार का पत्र लेकर रानी को पास पहुंचा, तो रानी को यह लगा कि शायद उसके मोह के कारण वह अपने कर्तव्य के प्रति अडिग नहीं कर पाएंगे। इसलिए अपने इस शरीर को समाप्त कर देना ही ठीक है, वरना सरदार का मन इसी में अटका रहेगा। उन्होंने तलवार से अपने सिर को धर से अलग कर दिया। यह उसने पहले ही कह दिया था कि यह निशानी अपने सरदार को थाली में रखकर दे देना। सिर कटते ही उसका शरीफ धरती पर गिर गया। सैनिक हक्का-बक्का सा यह सब देखते रहा। उसका सिर रानी के बलिदान के आगे झुक गया।

सैनिक जब उस वीर स्त्री हाड़ी रानी का सिर लेकर सरदार चूड़ावत के पास पहुंचा, तो सरदार भी भौंचक रह गए। कुछ पल के लिए वाह सकते मैं आ गए, फिर थोड़ा होश लौटने पर उनके दिल में रानी के बलिदान का असर पड़ा। उन्होंने रानी को रक्त से अपने मस्तक पर तिलक लगाया और सिर को गले में लटका लिया। रानी के सिर को सरदार के गले में लटका देखकर उनको सभी सैनिक जोश में आकर दुश्मनों पर टूट पड़े। दुश्मनों की सेना  में घबराहट फैल गई ।

सरदार की कमान में वीर सैनिकों ने औरंगजेब की सेना को घेर लिया। पहाड़ी इलाका था। दुश्मनों पर तलवारों और भालों की बौछार कर दी। घनघोर युद्ध होने लगा। बड़ी वीरता से सरदार के सैनिक लड़े, परंतु दुश्मनों की विशाल सेना के सामने मुट्ठी भर सैनिक आखिर कहां टिक सकते थे, फिर भी साहसी सरदार चूड़ावत ने अपनी सेना से मुगलों की सेना के छक्के छुड़वा दिए।

औरंगजेब की हार हुई। उसका रूपनगर की राजकुमारी रूपवती को पाने का सपना धरा -का -धरा रह गया और उसे वहां से लौटना पड़ा। इसके बाद महाराणा राज सिंह और रूपवती का विवाह हो गया।

औरंगजेब पर विजय पाने के बाद सभी राजपूत सैनिक खुशी से अपने अपने घर लौट गए। औरंगजेब ने भी सरदार चूड़ावत की वीरता का लोहा मान लिया, चूड़ावत वापस नहीं लौटे। उन्होंने अपनी रानी की भाती अपना सिर भी तलवार से काट लिया और परलोक वासी हो गए। शायद उनके मन में अपनी रानी से स्वर्ग में मिलने की इच्छा रही होगी।

सरदार चूड़ावत की समाधि बनाई गई, जहां पर राजपूत लोग अब भी सिर झुकाते हैं।


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