भगवती दुर्गा की उत्पत्ति, कैसे हुई । पढ़ें पौराणिक कथा Maa Durga Ki Utpatti in Hindi

 

भगवती दुर्गा की उत्पत्ति, कैसे हुई । पढ़ें पौराणिक कथा  Maa Durga Ki Utpatti in Hindi
                        भगवती दुर्गा की उत्पत्ति

देवी का जन्म सबसे पहले दुर्गा के रूप में ही माना जाता है जिसे राक्षस महिषासुर का वध करने के लिए जन्म दिया गया था और यही कारण है कि उन्हें महिषासुर मर्दिनी भी कहा जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार देवताओं को भगा कर महिषासुर ने स्वर्ग पर कब्जा कर लिया था | असुरों के अत्याचार से तंग आकर देवताओं ने महाविष्णु चक्रधारी से  आराधना करने लगे। तब अन्यंत क्रोध में भरे हुए चक्रपाणि श्री विष्णु के मुख से एक महान तेज प्रकट हुआ, इसी प्रकार ब्रह्म , शिव तथा इन्द्र आदि अन्य देवताओं के शरीर से भी वड़ा तेज निकला। सब तेज मिलकर एक हो गया महान तेज का वह पूंज लपदों से घिरे पर्वत सा जान पड़ा उसकी लपदों संपूर्ण दिसाओ में व्याप्त हो रही थी।


संपूर्ण देवताओं के शरीर से प्रकट हुई उस तेज की कहीं तुलना नहीं थी। एकत्रित होने पर वह एक नारी के रूप में बदल गया और अपने प्रकाश से तीनों लोक आलोकित करने लगा। भगवान शिव जी का तेज था, उससे ईस देवी का मुख प्रकट हुआ। यमराज के तेज से उसके सिर मैं बाल निकल आए। श्री विष्णु के तेज से उसकी भुजाएं उत्पन्न हुई। चंद्रमा के तेज से दोनों स्तनों का और इंद्र के तेज से मध्य भाग ( कटी प्रदेश ) का उदय हुआ। वरुण के तेज से जंधाएं और पिंडलियां तथा पृथ्वी के तेज से नितंव भाग प्रकट हुआ और सूर्य का तेज उंगलियां प्रकट हुई 

वसुओ के तेज से हाथों की उंगलियां और कुबेर के तेज से नासिका प्रकट हुई। उन देवी को दांल प्रजापति के तेज से तीनों नेत्र अग्नि के तेज से प्रकट हुई। उनकी भौंहें संध्या के कान बायु के तेज से उत्पन्न हुई इसी प्रकार अन्य देवताओं के तेज से भी उन कल्याणमयी देवी के प्रदूभवि हुआ। तत्पशयान् समस्त देवताओं के तेज पुंज से प्रकट हुई दुर्गा देवी को देखकर महिषासुर के सताए हुए देवता बहुत प्रसन्ता हुए।


भगवान शंकर ने अपने त्रिशूल से एक त्रिसुल निकालकर उन्होंने दीया। भगवान विष्णु ने भी अपने चक्र से एक चक्र उत्पन्न करके भगवती को अर्पित किया। वरुण ने संघ भेंट किया। अग्नि ने उन्होंने शक्ति दी और भाइयों ने धनुष वह बाण से भरे हुए दो तरकाश प्रदान किया। सहस्र नेत्रोंवाले देवराज इंदिरा ने अपने वज्र से वज्र उत्पन्न करके दीया और एरावत हाधी से उतार कर एक घंटा भी प्रदान किया।

यमराज ने कालदंड से दंड, वरुण ने पाश, प्रजापति ने स्फटिक की माला तथा व्रह्मा जो ने कमंडलु भेंट किया । सुर्य ने देवी के समस्त रोम - कूपों में अपनी किरणों का तेज भर दिया । काल ने उन्हें चमकती हुई ढाल और तलवार दी। क्षीर समुद्र ने उज्जवल हार तथा कभी जीर्ण न होनेवाले दो दिव्य वस्त्र भेंट किए। साथ ही उन्होंने दिव्य चुड़ामणि, दो कुंडल, कड़े, उज्जवल अर्द्धचंद्र, सब वाहुओं के लिए कंगन , दोनों चरणों के घुंघरू, गले की सुंदर हंसली और सव उंगलियों में पहनने के लिए रत्नों की बानी अंगुठियां दीं।

विश्वकर्मा ने उन्हें अत्यंत निर्मल फरसा भेंट किया। साथ ही अनेक प्रकार के वस्त्र और कवच दिए। इनके अतिरिक्त मस्तक ओर वक्षस्थल पर धारण करने के लिए कभी न  कुम्हलान वाले कमलों की मालाएं ढी। सागर ने उन्हें कमल का फूल भेंट किया। हिमालय ने सवारी के लिए सिंह तथा भांति भांति के रत्न समर्पित किए


देवी के साथ असुरों के युद्ध

धनाध्यक्ष कुबेर ने मधु से भरी पानपत्र दिया तथा संपूर्ण नागों शेष ने जो इस पृथ्वी का धारण करते हैं उन्होंने बहुमूल्य मणियों से विभूषित नागहार भेंट किया। इसी प्रकार अन्य देवताओं ने भी आभूषण और अस्त्र-शस्त्र देकर देवी का सम्मान किया। तत्पश्चात् देवी ने बारंबार अटटहासपुर्वक उच्च स्वर में गर्जना की। उनके भयंकर नाद से संपूर्ण आकाश गूंज उठा। देवी का वह अत्यंत उच्च स्वर में किया हुआ सिंहनाद कहीं समा ना सका। आकाश उसके सामने लखु प्रतीत होने लगा। उस से बड़े जोर की प्रतिध्वनि हुई जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड में हलचल मच गई और समुद्र कांप उठे। पृथ्वी डोलने लगी और समस्त पर्वत हिलने लगे। उस समय देवताओं ने अत्यंत प्रसन्नता के साथ सिंहवाहिनी भवानी से कहा। देवी तुम्हारी जय हो। साथ ही महर्षियों ने भक्तिभाव से विनम्र होकर उनका पूजन किया।

संपूर्ण त्रिलोकी को क्षोभग्रस्त देखकर दैत्यगण अपनी समस्त सेना को कवच आदि से सुसज्जित कर, हाथों में हथियार लेकर खड़े हो गए। उस समय महिषासुर ने बड़े क्रोध में आकर कहां । आह यह क्या हो रहा है। फिर वह संपूर्ण असुरों से घिरकर उस सिंहनाद की और लक्ष्य करके दौड़ा और आगे पहुंचकर उसने देवी को देखा। जो अपनी  प्रभा से तीनों लोकों को प्रकाशित कर रही थी। उनके चरणों के भार से पृथ्वी दबी जा रही थी। माथे के मुकुट से आकाश में रेखा से खिंच रही थी तथा वे अपने धनुष की टंकार से सातों पतालों को क्षुब्ध किए दे रही थी। देवी अपनी हजारों भुजाओं से संपूर्ण दिशाओं को ढके हुए खड़ी थी।

तत्पश्चात् उनके साथ दैत्यों का युद्ध छिड़ गया। अनेक प्रकार के अस्त्र शस्त्रों के प्रहार से संपूर्ण दिशाएं डोलने लगीं। चिक्षुर नामक महान असुर महिषासुर का सेनानायक था। वह देवी के साथ युद्ध करने लगा। अन्य दैत्यों को चतुरंगिनी सेना साथ लेकर दूसरा सेनापति चामर भी लड़ने लगा। 60 हजार रथियों के साथ आकर उदग्र नामक दैत्य युद्ध करने लगा। असिलोमा नामक दैत्य, जिसका रोएं तलवार के समान तीखे थे, 5 करोड़ रथी सैनिकों सहित युद्ध में आ डटा। 60 लाख रथियों से घिरा हुआ वाष्कल नामक दैत्य भी उस युद्ध भूमि में लड़ने लगा।परिवारित नामक महादैत्य हाथी में सवार और घुड़सवार के अनेक दलों तथा 1 करोड़ रथियों की सेना लेकर युद्ध करने लगा। विडाल नामक दैत्य 5 अरब
 रथियों से घिरकर लोहा लेने लगा। इनके अतिरिक्त और भी हजारों महादैत्य रथ हाथी और घोड़ों की सेना साथ लेकर वहां देवी के साथ युद्ध करने लगे।

स्वय महिषासुर उस रणभूमि में करोड़ों रथों, हाथी और घोड़ों की सेना से घिरा हुआ घड़ा था । दैत्य के साथ तोमर, भिंदिपाल,  शक्ति मुसल खड्ग परशु और आदि अस्त्र-शस्त्र के साथ युद्ध कर रहे थे। कुछ दैत्यों ने उन पर शक्ति का प्रहार किया, कुछ दैत्यों ने पाशा फेंके तथा कुछ दूसरे दैत्यों ने खड्ग प्रहार करके देवी को मार डालने का प्रयास किया।


माँ दुर्गा के सभी नौ रूपों 

धन प्रदान करने वाली, शत्रुओं का विनाश करने वाली, दैत्यों का संहार करने वाली माता समय-समय पर अलग-अलग स्वरूपों में अवतरित हुईं, जो अलग-अलग नामों से विख्यात हुई। श्री दुर्गा जी की नौ मुर्तियां है, जिन्हें ‘नवदुर्गा’ कहते हैं। ‘नवदुर्गा’ का पाठ करने से समस्तदुखों का निवारण होता है। नौ दुर्गा कहलाने वाली देवियों के नाम इस प्रकार हैं:-


(1) शैलपुत्री, (2) ब्रह्मïचारिणी, (3) चन्द्रघंटा, (4) कुष्मांडा, (5) स्कन्दमाता, (6) कात्यायनी देवी, (7) कालरात्रि, (8) महागौरी और (9) सिद्धिदात्री ।


1) श्री राम और रावण के बीच संघर्ष 32 दिनों तक चला|

2) महाभारत वीर अभिमन्यु वध


माँ दुर्गा सिद्धि मंत्र

प्राचीन वेद ग्रंथों में सहस्त्रों मंत्र प्राप्त होते हैं जो उद्देश्य पूर्ति का उल्लेख करते हैं। मंत्र शक्ति का आधार हमारी आस्था में निहीत है। मंत्र के जाप द्वारा आत्मा, देह और समस्त वातावरण शुद्ध होता है। यह छोटे से मंत्र अपने में असीम शकित का संचारण करने वाले होते हैं।

इन मंत्र जापों के द्वारा ही व्यक्ति समस्त कठिनाईयों और परेशानियों से मुक्ति प्राप्त कर लेने में सक्षम हो पाता है। ऐसी ही एक मंत्र के बारे में आज हम आपको बताने वाले हैं।

ॐ एम क्लीं चामुण्डायै विच्चे यह मंत्र माँ दुर्गा का मंत्र है जिसके जाप से व्यक्ति आश्चर्यजनक लाभ होते हैं।

आपके लिए प्रस्तुत है मां दुर्गा के प्रिय मंत्र
 

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। 
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते।।




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