रानी दुर्गावती कौन थी । और उनका इतिहास ! Rani Durgavati history in Hindi

महोबा के राजा को एक कन्या रत्न की प्राप्ति हुई। उसका नाम दुर्गावती रखा गया। सन 1530 में जन्मी दुर्गावती वीर कन्या थी। बहुत सुंदर सुशील और गुणवती थी, साथ ही शिकार खेलने, घोड़े की सवारी करने, तीर तलवार चलाना और वीरतापूर्ण कहानियां सुनने की शौकीन थी। अपने पिता के साथ शासन कार्य देखने के कारण वह राजनीति में भी निपुण थीं।


धीरे धीरे अपने गुणों से सबको प्रभावित करती हुई दुर्गावती भरी हुई और गोंडवाना के राजा दलपति शाह की वीरता से प्रभावित हो गई। विवाह योग्य आयू हो जाने की वजह से उनके पिता मालवा नरेश उनके विवाह के लिए परेशान रहने लगे। वह चाहते थे की राजपूताने का कोई राजकुमार उनकी बेटी से विवाह करें।

दुर्गावती क्या दलपति शाह के लिए प्रेम देखकर भी उनका पिता उनसे उसका विवाह नहीं करना चाहते थे, क्योंकि वह उन्हें पसंद नहीं करते थे। दलपति शाह भी दुर्गावती से विवाह करना चाहते थे, दोनों ही एक दूसरे को पसंद करते थे। अतः दोनों ही राजाओं में युद्ध हुआ। उस युद्ध में दलपति शाह की जीत हुई और उन्होंने दुर्गावती से विवाह कर लिया। इस तरह दुर्गावती ,रानी दुर्गावती बन गई और अपने पति के साथ गढ़ मंडल रहने लगीं। दोनों पति पत्नी एक दूसरे के साहस तथा वीरता का बहुत सम्मान करते थे। इसी बीच उनको एक पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसका नाम उन्होंने वीर नारायण रखा।

दुर्गावती के विवाह के बाद उनके पिता की मृत्यु हो गई। पिता के राज्य को बादशाह अकबर ने अपने अधिकार में कर लिया। इस प्रकार महोबा क्लिंजर पर मोबाइल शासन स्थापित हो गया।

विवाह के चार वर्ष बाद उसके पति दलपति शाह उन्हें और एक अबोध शिशु को छोड़कर ईश्वर को प्यारे हो गए।

दुर्गावती पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। इस असीम दुख मैं भी रानी दुर्गावती ने साहस का दामन नहीं छोड़ा और अपने पुत्र का पालन राजसी ढंग से करती रही। साथ ही साथ राज्य कार्य भी अच्छी तरह करती रही। उन्होंने यह सब करने में बहुत धैर्य तथा समझदारी से काम लिया। बह प्रजा के सुख दुख का बहुत ध्यान रखती थीं। उन्होंने चतुर तथा बुद्धिमान आधार सिंह को अपना मंत्री बनाया। राज चलाने में उसकी सलाह को महत्व देती थी। उन्होंने अपने राज्य का विस्तार किया, सेना को मजबूत किया और वीरता, उदारता, चतुराई से राजनैतिक एकता स्थापित की। उसका राज्य गोंडवाना शक्तिशाली समृद्ध और सम्पन्न राज्यों में शामिल किया जाने लगा। रानी दुर्गावती की ख्व्याति फैलने लगी।

रानी दुर्गावती तथा उसके राज्य की सम्पन्नता के किस्से बादशाह अकबर तक भी पहुंचने लगे। अकबर तो हमेशा ही अपने राज्यों का विस्तार करने के बारे में विचार करते रहते थे। इस कारण गोंडवाना राज्य को भी अपने आधीन करने की सोचने लगा। पहले वह तत्पर नहीं थे, लेकिन अपने सरदारों की सलाह से वह ऐसा करने के लिए तैयार हो गया। अकबर ने आसफ़ खां नामक सरदार को गोंडवाना राज्य पर चढ़ाई करने का आदेश दिया।

आसफ़ खां को दुर्गावती की शक्ति का अनुमान नहीं था। उसने सोचा एक स्त्री उनके सामने भला कैसे टिक पाएगी। इसलिए उन्होंने गढ़ मंडल पर चढ़ाई कर दी । रानी दुर्गावती को मंत्रिमंडल ने उन्हें अकबर की सेना से न भिड़ने की सलाह दी, परंतु रानी दुर्गावती बहुत स्वाभिमानी स्त्री थी। उन्हें एक सामान्य से सूबेदार के सामने झुकना स्वीकार नहीं था। साथ ही उन्हें अपने सैन्य बल और अपने आप पर बहुत भरोसा था। उन्होंने सैनिक वेश धारण किया और रणक्षेत्र की और निकल पड़ी। वह स्वयं ही सेना का संचालन कर रही थी। इनके साहस तथा शौर्य को देखकर उनकी सेना भी बड़ी वीरता से युद्ध क्षेत्र में उतर आई। और बहादुरी से युद्ध करने लगी।


  • रानी को कुशल संचालन और वीरता से शत्रुओं की सेना नष्ट होने लगी और अंत में आसफ़ खां अपनी जान बचाने की खातिर पीठ दिखाकर भाग खड़ा हुआ।

गढ़ मंडल में जीत की खुशियां मनाई गई। रानी के शौर्य की कीर्ति चारों और फैल गई, परंतु अकबर इस हार से बहुत शर्मिंदा हुआ। उसने अपने को बहुत अपमानित महसूस किया और ख़ून के घूंट पीकर रह गया। अकबर ने लगभग डेढ़ साल बाद फिर आसफ़ खां को गड़ मंडल पर आक्रमण करने का आदेश दिया। वह अपनी हार का बदला लेने पर तुला हुआ था। इस बार भी आसफ़ खां को गड़ मंडल से युद्ध करते समय नाकों चने चबाने पड़े।

रानी तथा आसफ़ खां मैं भयंकर युद्ध होने लगा। मुगलों की तोपों के आगे रानी ने हार नहीं मानी। खून की प्यासी तलवार से उन्होंने अनेक तोपचियों के सिर धड़ से अलग कर दिए। वह हाथी पर सवार रणचंडी बनी अपने दुश्मनों का सफाया कर रही थी। उनके सैनिक भी उत्साहित होकर बहादुरी से लड़ रहे थे। दोनों सेनाओं के बीच घमासान युद्ध हुआ। इस बार भी आसफ़ खां रानी दुर्गावती के आगे टिक नहीं पाया और उसे दूसरी बार हार का मुंह देखना पड़ा। दो बार हारकर और वह भी एक स्त्री से। आसफ़ खां बहुत लज्जित हुआ और फिर से जान बचाकर भागा।

रानी राजधानी में विजय उत्सव मना रही थी। सभी लोग बड़े उत्साहित थे। कितने भी स्वामीभक्त दरबारी हों, पर उनमें कोई न कोई गद्दार निकल ही जाता है। रानी के एक सरदार ने भी रानी को धोखा देकर आसफ़ खां को गढ़ मंडल का सारा भेद बता दिया।आसफ़ खां तो वैसे ही बन कुछले हुए नाग की तरह ईर्ष्य तथा अपमान की अग्नि मैं सुलग रहा था। उसने एक बार फिर फन उठाया और तीसरी बार गढ़ मंडल पर हमला कर दिया। उसे अपनी हार और अपमान का बदला लेना था।

इस युद्ध में रानी ने अपने युवा पुत्र वीर नारायण को भी सेना संचालन का भार सौंपा और दूसरी और सेना का नेतृत्व स्वयं ही संभाला। रानी के ही समान उनका बेटा भी दुश्मनों के छक्के छुड़ाने लगा। वह बड़ी वीरता से सेना का संचालन कर रहा था। इसी तरह वीरता से लड़ते-लड़ते वीर नारायण घायल होकर घोड़े से गिर पड़ा। रानी ने अपने पन्द्रह वर्षीय पुत्र को घायल होकर गिरते देख, परंतु वह फिर भी विचलित न हुई और उसी उत्साह  से दुश्मन की सेना का सफाया करती रही।

कुछ सैनिकों ने वीर नारायण को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया। किंतु उसकी हालत ठीक नहीं थी। इसलिए रानी से निवेदन किया गया कि वह अपने पुत्र के अंतिम दर्शन कर ले। वीर रानी ने उस समय अपनी ममता को त्यागकर अपने कर्तव्य पर ज्यादा ध्यान दिया। उन्हे इस बात का गर्व था। उन्होंने सैनिक से कहा की अब वह अपने बेटे से मिलने उस लोक मैं जाएगी। बेटे का बलिदान देखकर इनमें विशेष जोश पैदा हो गया। वह दुश्मनों पर टूट पड़ीं। इसी समय एक बाण उन्हें बेद गया, जिससे बह घायल हो गई। उसी समय अन्य बाण भी उन्हेल लगे और वह लहू-लुहान हो गई। उस समय वह समझ गई कि अब उनका बच पाना कठिन है, तो दुश्मनों के हाथ में जाने के बजाय उन्होंने स्वयं ही अपने पेट में तलवार घोंप ली और वीरगति को प्राप्त हुई। उन्होंने अपने राज्य के लिए प्राणों का बलिदान दे दिया।

आज भी भारत की वीर नारियों का ज़िक्र आता है तो रानी दुर्गावती का नाम बहुत ही आदर और सम्मान से लिया जाता है।

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