वीरमाता जीजाबाई माहान्ता भरी इतिहास। Veermata Jijabai Mahanta history in Hindi

जीजा बाई का जन्म सन 1630 में सिंघखेड़ा के राजा लखुजी के घर में हुआ था। लखुजी को अहमद नगर के सुल्तान की और से राजा की उपाधि प्राप्त थी। वैसे वह बहुत बड़े ज़मींदार थे। सुल्तान के दरबार में उनका बहुत आदर सम्मान था।

वीरमाता जीजाबाई माहान्ता भरी इतिहास। Veermata Jijabai Mahanta  history in Hindi

जीजाबाई बचपन से ही बड़ी निडर थी। स्वभाव से चंचल होने पर भी वह अपने इरादों की पक्की थी। बड़ी समझदारी से हर काम करती थी। वह देवी भवानी की सच्ची भक्त थीं। जीजाबाई का विवाह तभी तय हो गया था, जब वह सिर्फ चार साल की थी। लखुजी के घर में उत्सव था। उसमें भालो जी अपने पुत्र के साथ, जिसका नाम शाहजी था वहां आए थे। दोनों की माता पिता को शाहजी तथा जीजाबाई की जोड़ी जांच गई। भालो जी तथा लखुजी ने सबके सामने जीजाबाई तथा शाहजी की शादी पक्की कर दी।

भालोजी भोसले लखुजी के अधीन काम करते थे। शुरू में तो यह बात लखुजी को अखरी, परंतु सुल्तान की मर्जी से जीजाबाई का विवाह शाहजी के साथ कर दिया गया। विवाह के समय दोनों के ही उम्र बहुत कम थी। धीरे धीरे जब शाहजी बड़े हुए, तो बीजापुर के दरबार में नौकरी करने लगे। जीजाबाई तथा शाहजी दोनों ही वीरता से परिपूर्ण थे। शाहजी ने बीजापुर के दरबार की और से कई युद्ध लड़े थे। सभी युद्ध में वह विजयी हुए थे।

शाहजी बीजापुर के नवाब को बहुत ही सम्मान देते थे। वह नवाब के शुभचिंतक तो थे ही, साथ ही चाटुकारी भी किया करते थे, जो बात जीजा बाई के बिल्कुल पसन्द नहीं थी। शाहजी बीजापुर के नवाब की हर इच्छा को पूर्ण करते थे। उनके लिए वह कुछ भी कर सकते थे। इसी बात पर जीजाबाई से उनका झगड़ा होता रहता था।

जीजाबाई में देशभक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी थी। अपने देश की संस्कृति के लिए उनके दिल में बहुत ही सम्मान था। वह खुले विचारों की स्त्री थी। किसी की भी गुलामी या अधीनता उन्हें स्वीकार नहीं थी।वह अपनी तरह की अकेली महिला थी। कहीं भी अन्याय और अधर्म को सहन नहीं कर सकती थी। उस समय देश में अत्याचार से सारा देश पीड़ित था। जीजाबाई ने मां भवानी के मंदिर में प्रार्थना की कि वह अत्याचार तथा अन्याय को सहन नहीं कर पा रही है, अतः मां भवानी उन्हें एक ऐसी सन्तान पुत्र के रूप में प्रदान करें , जो उनके सपनों को साकार करें। वह सन्तान के जरिये देश का भला करना चाहती थी। ऐसा कहा जाता है कि सच्चे मन से प्रार्थना करने की वजह से उनकी प्रार्थना तथा वरुण पुकार सुनने पर शिवा भवानी ने खुश होकर ने दर्शन दिए। जीजाबाई को उनकी इच्छा के अनुसार ही सन्तान पाने का वरदान दिया। शिवा भवानी की कृपा से 10 अप्रैल 1626 को उन्हें एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम शिवाजी रखा गया।

शिवाजी का पालन पोषण जीजाबाई बहुत ही अनुशासन से करने लगी। जीजाबाई की ही तरह शिवाजी भी शिवा भवानी के भक्त हो गए। वह रोज शिवा भवानी के चरणों में श्रद्धा सुमन चढ़ाने लगे। शिवा का मन भी अधर्म देखकर, चारों और जुल्मों को देखकर परेशान होता था। वह मन ही मन भवानी से भरथना करते कि उन्हें शक्तिवान करें, ताकि बहुत देश की स्त्रियों और सम्मान तथा धर्म की रक्षा कर सकें। यह भी कहा जाता है कि शिवाजी की करुण पुकार सुनकर उनको भी देवी ने दर्शन दिए और एक तलवार प्रदान की। शिवाजी ने उस तलवार का नाम भवानी रखा।


जीजाबाई ने वीर शिवाजी को वीरता के संस्कार दिए। सिंहगढ़ का किला बहुत मजबूत समझा जाता था। उसकी सुरक्षा के लिए मुगलों की बड़ी भारी सेना तैनात थी। उस किले पर मुगलों का झंडा हमेशा लहराया करता था। जीजाबाई को उस झंडे का सिंहगढ़ पर फहराना जरा भी पसन्द नहीं थी। जीजाबाई ने शिवाजी को प्रेरित किया कि वह सिंहगढ़ पर हमला करके उस झंडे को उतार फेंके। शिवाजी जानते थे कि सिंहगढ़ के किले को जितना बड़ी टेढ़ी खीर है। बड़ी सेना का पहरा उस पर हर समय रहता है। उस पर लहराते झंडे को उतारना एक तरह से असंभव है। इस बारे में जब उन्हेंने जीजाबई को बताया, तो वह गुस्से में आ गई और शिवाजी तथा अपनी कोख को धिक्कारने लगी। शिवा भवानी का पुत्र होने का वास्ता देकर उसे उत्साहित किया और कहा कि यदि वह इस काम को करने में असमर्थ है, तो वह खुद ही फौज लेकर सिंहगढ़ के किले पर आक्रमण करेंगी और झंडे को उतार फेकेंगी।

जीजाबाई के इस ओजपूर्ण भाषण का शिवाजी पर अनुकूल प्रभाव पड़ा और उत्तेजित होकर उसी समय ताना जी को आदेश दिया कि फौजें लेकर सिंहगढ़ के किले पर हमला कीजिए। हमें सिंहगढ़ से उस झंडे को उतारकर उस पर अधिकार करना है। शिवाजी की आज्ञा पाते ही तानाजी ने सेना सहित चढ़ाई कर दी। मुगलों की सेना के साथ भयंकर युद्ध हुआ और विजय भी हुई। ताना जी ने सिंहगढ़ पर अधिकार तो कर लिया, परंतु वीरगति को प्राप्त हुई।

यह खबर वीर शिवाजी के लिए दुख तथा सुख दोनों ही तरह का भाव लिए हुए थी। एक ओर तो उन्हें अपनी जीत का खुशी थी, दूसरी ओर ताना जी जैसे रत्न को खोने का दुख भी था। अधर्म तथा अन्याय को देखकर जीजाबाई का दिल रो उठाता था। उन्होंने महाराष्ट्र की स्वतन्त्राता के लिए जनता का आहवान किया। उनके ही प्रेरित करने पर महाराष्ट्र की धरती गुलामी से आजाद हो सकी और स्वतन्त्र राज्य स्थापित हो गया। इसके लिए अनके पुत्र वीर शिवाजी ने बहुत कोशिश की और सराहनीय कार्य किया था।

जीजाबाई ने अपना स्वतन्त्र राज्य लाने में खुद हथियार नहीं उठाए, परंतु अपनी ओजपूर्ण ‌ बाणी द्वारा पुत्र को उत्साहित करने की विशेष योग्यता रखी थी। उन्ही के प्रेरित करने पर उनका पुत्र शिवाजी मुगल के सम्राट औरंगजेब को युद्ध में हराकर महाराष्ट्र को आजादी दिलाने में सफल हुआ। अपनी कोशिश से अनेक कठिनाइयों को पार करते हुए महाराष्ट्र की जनता को अनेक जन्मसिद्ध अधिकार दिलाने में जीजा बाई का कोई जोड़ नहीं था।


शिवाजी को जो तलवार शिवा भवानी से प्राप्त हुई थी, उसी तलवार से अपनी मां की प्रेरणा करके अफजल के सामने जाकर उसका वध किया। औरंगजेब के फन्दों को काटकर आगरा किले से निकालने में सफलता प्राप्त की थी।

अपने वीरमाता जीजाबाई तथा स्वामी रामदास जी के आशीर्वाद से शिवाजी लगातार सफलता से बढ़ते रहें। शाहजी और जीजाबाई के विचार आपस मैं नहीं मिलते थे। वहीं पर उन्होंने वीर शिवाजी का पालन पोषण अपने पति से अलग रहकर किया था। उनके पति ने दूसरा विवाह कर लिया था। वीर शिवाजी को पालने में उन्हें बड़ी बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। वह शिवाजी को लेकर पुणे चली गई थी और दादा कोणदेव की मदद से उन्होंने शिवाजी का पालन पोषण किया था।

शिवाजी की उन्नति और युद्ध में जीत के लिए प्रेरणा देने वाली उनकी माता जीजाबाई ही थी। उनका जीवन पथ बड़ा मुश्किलों भरा था, उसी पर चलकर उन्होंने इतनी ख्याति प्राप्त की। अपने दृढ़ व्यक्तित्व के कारण ही वह जीवन की अनेक कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर पाई। 70 साल की उम्र में 16 जून 1674 में उनकी आत्मा परमात्मा में विलीन हो गई। वीर माता के रूप में उनको हमेशा ही याद रखा जाएगा।


टिप्पणी पोस्ट करें (0)
नया पेज पुराने