त्राटक के महत्व क्या है | What is the importance of trataka in Hindi

त्राटक एक ऐसा विज्ञान है जिसकी खोज और विकास ऋषियों और मुनियों वह तपस्वियों द्वारा की गयी है। इस देश के पवित्र भूमि पर सदैव से ही योगी पुरुष जन्म लेते रहे हैं। इसलिए यह देश जोगियों का देश कहा गया है। इन्ही योगियों ने अभ्यास तथा प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा स्थूल पदाथें को लेकर कारण जगत की आखरी सीमा तक सूक्ष्मता से ज्ञान प्राप्त किया है। ऐसे जीवन-मुक्त योगी तत्वज्ञानी होते हैं।

त्राटक के महत्व क्या है | What is the importance of trataka in Hindi

ऐसे योगी ही अभ्यास के द्वारा विज्ञानमय  कोष की शुरु से लेकर  अन्तिम सीमा तक विकास करके ज्ञान में स्थित हो सके हैं। तथा इस सत्य को उन्होंने अपने जीवन में उतारा है। इस सत्य को जानने के इनके मार्ग व तरीके आपस में भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। लेकिन अन्त में एक ही अवस्था पर सभी पहुंचते हैं।


त्राटक शब्द त्रि के साथ टकी बांधने की सन्धि से बना है।

वस्तुत शुद्ध शब्द त्र्याटक  अर्थात जब साधक किसी वस्तु पर अपनी दृष्टि और मन को बांधता है, तो वह क्रिया त्र्याटक कहलाती है, त्र्याटक शब्द आगे चलकर त्राटक हो गया है। दूसरे शब्द में त्राटक अर्थ है -किसी पदार्थ यह वस्तू को बिना पलक झपकाए टकटकी लगाए देखते रहना। प्रत्येक प्राणी सामान्य प्रभाव होता है कि जब तक वह जाग्रत अवस्था में रहेगा, तब तक वह अवश्य ही पलकें झपकाता रहेगा। कोई भी प्राणी लगातार बिना 

पलक झपकाए किसी पदार्थ या दृश्य को नहीं देख सकता है । ताकि आंखों की बाहरी परत पर वायु के  झोंकों या वायु का प्रभाव ना पड़े। पलक झपकाने से आंखों की बाहरी परत नम बनी रहती है। इससे आंखों की सुरक्षा होती है तथा वायु में विद्यमान सूक्ष्म धूल कणों से बचाव होती है।

आंखों की पलकें बार-बार अपने आप झपकती रहती है। पलकें झपकाने का कार्य शरीर में स्थित प्राण अपने आप करता है। भौतिक शरीर में व्यवस्थापूर्वक क्रिया होने की जिम्मेदारी प्राण की होती है। संपूर्ण ब्रह्माण्ड में व भौतिक शरीर में व्याप्त एक ही प्राण तत्व होता है। यह प्राण तत्व स्थूल रूप व सूक्ष्म रूप से सर्वत्र व्याप्त रहता है। सत्य तो यह है कि संम्पूर्ण अपरा प्रकृति स्वयं अपने आपको आकाश तत्व में अघिष्ठित होकर अपनी रचना वायु तत्व द्वारा करती है। 


यह प्रकृति अपने आपको तीन अवस्थाओं में रचती  है -

पहली कारण अवस्था में, दूसरी सुक्षम अवस्था में, तथा तीसरी स्थूल स्वरुप (अवस्था में ) अर्थात प्रकृति कारण रूप से कारण जात के रूप में, सूक्ष्म रूप से सूक्ष्म जगत के रुप में, और स्थूल रुप से स्थूल जगत के रूप में विद्यमान  रहती है। जिस प्रकार प्रकृति तीन अवस्थाओं रहती है, उसी प्रकार संपूर्ण प्राणियों को शरीर भी तीन अवस्थाओं में रहते हैं -कारण अवस्था में कारण शरीर, 2 सूक्ष्म अवस्था में सूक्ष्म शरीर। 3 स्थूल अवस्था में स्थूल शरीर। प्रत्येक प्राणियों के स्थूल शरीर के अंदर सूक्ष्म शरीर के व्याप्त करता है और सूक्ष्म शरीर के अंदर कारन शरीर व्याप्त करता है। स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर का घनत्व बहुत ही कम होता है। इसलिए स्थूल शरीर के अंदर सूक्ष्म शरीर व्याप्त हो जाता है। इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर से कारण शरीर का घनत्व बहुत ही कम होता है।

इसलिए सूक्ष्म शरीर के अंदर कारण शरीर व्याप्त हो जाता है स्थूल शरीर सम्बन्ध स्थूल जगत से होता है। सूक्ष्म शरीर का सम्बन्ध सूक्ष्म जगत से रहता है और कारण  शरीर का सम्बन्ध कारण जगत से रहता है अर्थात प्रत्येक प्राणी का स्थूल , सूक्ष्म और कारण जगत से सदैव बना रहता है।स्थूल नेत्रा में सूक्ष्म व कारण जगत नहीं दिखाई देती है, क्योंकि इनका घनत्व बहुत ही कम होता है।

मनुष्य की आंतरिक विकास ना होने के कारण वह अपने आप को सिर्फ स्थूल शरीर ही माने रहता है।
इसी प्रकार प्राण भी तीनों अवस्थाओं मैं घनत्व के अनुसार व्यवस्था पूर्वक क्रिया करता रहता है। इसी प्राण तत्व में जब किसी प्रकार से उसकी व्यवस्था में असन्तुलन आ जाता है, तब शरीर के अंदर विभिन्न प्रकार के रोग व अवरोध आ जाता है। प्राणों के सन्तुलन बना रहे। इसके लिए प्रत्यक्ष प्रमाण से युक्त योगियों ने भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्य करने के कारण प्राणों के भिन्न-भिन्न नाम दिया है। इससे प्राणों के विषय में समझाने में आसानी रहती है। एक ही प्राण मुख्य रूप से पांच प्रकार से भौतिक शरीर में कार्य करता है इसलिए कार्य के अनुसार प्राणों के पांच नाम होता है।

यह नाम इस प्रकार से है: 1 प्राण / 2 अपान /  3 व्यान / 4 समान / 5 उदान

त्राटक के महत्व क्या है | What is the importance of trataka in Hindi


इन पांचों  प्राणों के एक - एक उपप्राण होता है, इसलिए पांच उपप्राण हो गयो। इन उपप्राणों  के नाम इस प्रकार है

1- नाग / 2- कूर्म / 3- कृकल / 4- देवदात्त / 5-धनन्जय । महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इसमें जो कूर्म नाम का उपप्राण है। वहीं प्राणियों के शरीर में विद्यमान हुआ पलकें झपकाने का कार्य करता है।

कूर्म नाम का प्राण ही हम सभी मनुष्य की पलकें झपकाने का कार्य करने का कारण, जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त पलकें झपकाती रहती है। यह कार्य प्राणों के द्वारा होता है, इसलिए निरन्तर प्रक्रिया स्वमेव होती रहती है। अभ्यासी को अभ्यास के द्वारा धीरे धीरे ही इसी प्राण के स्वभाव को रोकना है, तथा कुछ समय तक इस प्राण पर अधिकार प्राप्त करना है। प्राण पर अधिकार प्राप्त करने के लिए प्राणों को शुद्ध व व्यापक बनना आवश्यक है।

प्राणायाम के द्वारा प्राणों को शुद्ध व्यापक बनाया जा सकता है। हमारे शास्त्रों मैं प्राणों के शुद्ध करने के लिए विभिन्न प्रकार के प्राणायाम करने का तरीके से बताए गये हैं। आजकल हमारे समाज में बहुत सी ऐसी संस्थायें है

जो प्राणायाम करना सिखाती है अथवा बाजार में बहुत से लेखकों की लिखी हुई पुस्तक मिल जाएगी।हम यही राय देंगे कि आप किसी अनुभवी पुरुष के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में प्राणायाम करने का अभ्यास करें। जिसने प्राणायाम पर अभ्यास के द्वारा पारंगत प्राप्त कर रखी है तो अति उत्तम है।


आप सोच रहे होंगे कि त्राटक का प्राणायाम से कया सम्वन्ध है।

मैं स्पष्ट उत्तर दे रहा हूं -अभ्यासी के अभ्यास के द्वारा पलक झपकाना रोकना है। पलक झपकाने का कार्य प्राण के द्वारा होता है । आंखों के द्वारा तेजस् रुप में वृत्तियां चारों ओर फैलकर दृश्य का स्वरुप धारण करती रहती है, फिर उसी दृश्य का प्रतिबिम्ब मस्तिष्क पर बनता है। इन्ही इन्ही वृत्तियों के प्रवाह को रोकने का प्रयास त्राटक के अभ्यास के द्वारा किया जाता है। इस सारी प्रक्रिया मैं बहुत बड़ा कार्य प्राणों का ही होता है यदि अभ्यासी उचित रीति के द्वारा प्राणों के रोककर अपने अनुसार चलाने का अभ्यास करें तथा कुछ समय तक कुम्भक के द्वारा प्राणों पर अधिकार प्राप्त कर ले तब ऐसे अभ्यासी को त्राटक पर शीघ्र व दूरगामी परिणाम अच्छे रूप में प्राप्त हो सकते है।

अज्ञानता के कारण संसार में लिप्त हुआ मनुष्य अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए रात दिन कठोर परिश्रम मैं लगा रहता है। ऐसा मनुष्य चाहे जितने भौतिक पदार्थों वह वस्तुओं को प्राप्त कर ले फिर भी इच्छाएं समाप्त नहीं होती है। एक वस्तु प्राप्त कर लेने के बाद, उसी समय दूसरी वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा फिर  प्रकट हो जाती है। इन्ही इच्छाओं की पूर्ति के लिए वह अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत कर देते हैं। अन्त में वृद्धावस्था मैं
तृष्णा से युक्त हुआ मानसिक क्लेश की अनुभूति करता रहता है, क्योंकि उसका भौतिक शरीर पहले के सामान परिश्रम करने का योग्य नहीं रह जाता है। अब सिर्फ इच्छाएं चलती रहती है, इन इच्छाओं की पूर्ति नहीं कर सकता है। हां ऐसी अवस्था में अपने घर के सदस्यों पर अपनी राय थोपता रहता है कथा जब घर के सदस्य उसकी बात नहीं मानते हैं

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