झांसी की रानी का इतिहास (हिंदी में)। jhansi rani lakshmi bai history

महाराष्ट्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर बाई नामक ग्राम में सतारा नगर के पास 16 नवंबर 1835 को यहां एक कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम मनुबाई रखा गया। मोरोपन्त बाजीराव पेशवा के भाई अप्पा साहेब के पास काम करते थे। अप्पा साहेब बहुत भले पुरुष थे। अप्पा साहेब की मृत्यु के बाद मोरोपन्त जी बाजीराव पेशवा के पास आ गए। बाजीराव पेशवा की कोई संतान नहीं थी, इसीलिए उन्होंने दो पुत्र गोद लिया। एक नाना साहब दूसरे राय साहब। मनु बाई उन्ही दोनों पुत्रों के साथ पढ़ने लिखने जाने लगी। उनका बचपन उन्हीं लोगों के साथ बीतने लगा।
झांसी की रानी का इतिहास (हिंदी में)। jhansi rani lakshmi bai history


मनु बहुत ही शक्तिशाली तथा बुद्धि मती थी। वह वीरता, साहस, दयालुता, तथा सौंदर्य के गुणों का अनोखा संग्रह थी। मनु 5 वर्ष की ही थी कि उनकी माता की मृत्यु हो गई। मनु के पिता पूर्ण के पेशवा बाजीराव के दरबार में थे, मां ना होने के कारण वह मनू को वही ले जाते थे। मनु का बचपन नाना साहेब तथा राय साहेब के साथ ही बीता। वह उन्ही लोगों के साथ पढ़ती थी। उन दोनों बच्चों को अस्त्र शस्त्र चलाते देखकर वह भी सब सीख गई।मनु ने बहुत लगन से तीर तलवार चलाना तथा युद्ध करना सीखा। घुड़सवारी वह बहुत अच्छी कर लेती थी। यह उनके मुख्य प्रिय खेल बन गए। सभी लोग यह देख कर हैरान हो जाते थे कि इतनी नन्ही वाला इन सब कामों में कितनी कुशल है।

बहुत छोटी उम्र में मनु का विवाह झांसी के महाराज गंगाधर राव के साथ कर दिया गया। पति के घर में वह रानी लक्ष्मीबाई कहलाने लगी। अपने पति से काफी छोटी होने पर भी हर काम बहुत समझदारी से करती थी। इसलिए गंगाधर राव उनका बहुत आदर करते थे। शादी के कुछ समय बाद उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया, परंतु वह ज्यादा समय तक जीवित न रहा। सिर्फ 3 महीने के बाद ही उसकी मृत्यु हो गई। गंगाधर राव पुत्र की मृत्यु के दुख को सह नहीं पाए और अंत में यही दुख उनकी मृत्यु का कारण बना। उत्तराधिकारी न होने के कारण मृत्यु से पहले उन्होंने दामोदर राव, जो कि उन्ही के परिवार का पुत्र था, उसको गोद लेकर अपना उत्तराधिकारी बनाया। बालक के गोद लेने से दूसरे दिन ही दामोदर राव की मृत्यु हो गई। पूरी झांसी शोक में डूब गई। लक्ष्मी बाई के ऊपर दुखों का पहाड़ टूट गया था, फिर भी उस साहसी नारी ने उस संकट के समय में बहुत हिम्मत से काम लेते हुए व्यवहार कुशलता से राजकाज संभाला।

रानी लक्ष्मीबाई के जीवन में बहुत से उतार चढ़ाव आए। उस समय भारत पर अंग्रेजों का राज था। रानी लक्ष्मी बाई के पति की मृत्यु होते ही अंग्रेजों को लगा कि अव तो झांसी का कोई राजा नहीं रहा। अतः उन्होंने कूटनीति से काम लेना शुरू किया। डलहौजी ने सोचा कि यह मौका अच्छा है और लावारिस झांसी पर ब्रिटिश राज का झंडा फहरा दिया जाए। अंग्रेजों ने झांसी को अपने राज्य में मिला लिया। उसकी रक्षा के लिए सेना भी रख दी। रानी लक्ष्मी बाई को पांच हजार रुपए मासिक पेंशन देने की घोषणा भी कर दी। महारानी ने इस अन्याय के लिए अनेक अपीलें की, किंतु उनके एक भी अपील पर ध्यान नहीं दिया गया। अंग्रेजों ने रानी को पत्र में लिखा कि राजा के कोई पुत्र ना होने के कारण झांसी पर अब अंग्रेजों का अधिकार होगा।

अंग्रेजों की इस चाल से रानी लक्ष्मी बाई गुस्से के कारण तिलमिला उठी। उन्होंने भी घोषणा कर दी कि झांसी की अपनी एक अलग पहचान है वह किसी पर निर्भर होकर नहीं रहेगी। अपनी प्रजा तथा सैनिकों पर रानी को पूरा भरोसा था। वह सब भी अपनी झांसी देने को बिल्कुल तैयार नहीं थे। रानी ने किले के दीवारों पर तोपें लगवा दी। कुशल युद्ध नीति और रानी का साहस तथा सैनिकों को किलेबंदी देखकर अंग्रेजों ने दातों तले अंगुली दबा ली। अंग्रेजों ने किले पर हमला कर दिया। दोनों और सैनिकों में जोरदार युद्ध होने लगा। 8 दिन तक लगातार युद्ध होता रहा। थोड़ी सेना होने पर भी रानी के सैनिक बहुत ही वीरता से लड़े, उनका आत्मविश्वास देखने लायक था। रानी ने निश्चय कर लिया था कि झांसी पर अंग्रेजों का झंडा नहीं फराहने देगी। नहीं की देखरेख में सेना में बहुत उत्साह था।

रानी की स्त्री साइना में एक सैनिक झलकारी बाई थी, जो कि रानी की सखी तथा विश्वासपात्र थी। अपने प्राणों की परवाह किए बिना वह रानी का साथ दे रही थी। वह रानी के एक सेनानायक की पत्नी थी उनकी सकल रानी से मिलती-जुलती थी। वह रानी के लिए पूरी तरह समर्पित थी। उनमें देश प्रेम की भावना रानी की तरह कूट-कूट कर भरी थी। रानी ने उनकी यह भावना देखकर उन्हें घुड़सवारी तथा शस्त्र संचालन की शिक्षा देकर एक योग्य सैनिक बना दिया था। वह बिना किसी डर के युद्ध कर शक्ति थी

अंग्रेजों की सेना ने झांसी की सेना को चारों ओर से घेर लिया। दुर्ग के मुख्य द्वार के रक्षक तथा तोपखाने के रक्षक अपना कर्तव्य करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। रानी जब अंग्रेजों की सेना से घिर गई, तो उनके सलाहकारों और सहना नायकों ने उनसे निवेदन किया कि दुर्ग से बाहर ना निकल जाए, परंतु वह इसके लिए राजी नहीं थी, पर झांसी की भलाई के लिए वह इसके लिए तैयार हो गई। जब रानी को किले से सुरक्षित निकालने की योजना बनाने लगी, तब झलकारी बाई ने उनकी बड़ी सहायता की। रानी के समान ही रंग रूप की होने की वजह से वह अंग्रेजों को धोखा देने के लिए रानी के कपड़े पहनकर युद्ध करती हुई अंग्रेजों की सेना से भीड़ गई। अंग्रेज उन्हें रानी समझकर उनसे युद्ध करते रहें। काफी देर तक उन्हें उलझाए रही, इसी बीच रानी को वच निकालने का मौका मिल गया। चूंकी रानी ने दुर्ग के अंदर एक एक अंग्रेज को चुनकर मार दिया था, इसलिए अंग्रेज़ गुस्से से पागल हो गए थे।


दुर्ग के अंदर कोई अंग्रेज नहीं बचा था। इस युद्ध में महारानी की वीरता और साहस से अंग्रेज बहुत ही चकित थे। सन 1857 के विद्रोह का सेनानी तात्या टोपे अपनी सेना लेकर महारानी की सहायता के लिए पहुंच गया । अंग्रेजों की मार से तात्या की फौज घबरा गई। उनकी अनेक तोपें उनके हाथ लग गई।

झलकारी बाई के सहयोग से अपने पुत्र को पीछे पेट पर बांधकर रानी लक्ष्मी बाई एक हजार सैनिकों के साथ अंग्रेजों की सेना पर टूट पड़ी। रानी ने दुर्ग की दीवार के ऊपर से घोड़े पर चढ़कर छलांग लगाई और लगातार अंग्रेजों की सेना से लड़ते हुए कालपी की और चल पड़ी। कालपी की और घोड़े पर दौड़ते हुए रास्ते में अचानक एक नाला आया। उस नाले को फांदने के कोशिश में घोड़े का संतुलन बिगड़ गया और घोड़ा गिर पड़ा। उसी समय एक अंग्रेज ने रानी के सिर पर प्रहार किया। उनके सिर मैं भयानक चोट आई, फिर भी वह वीरता पूर्वक लड़ती रही। उसके बाद शत्रुओं ने रानी की छाती में भाले से चोट की। घोड़े से गिरने के बाद भी उन्होंने एक अंग्रेज को मार ही डाला।

घायल रानी को उनके सैनिक गंगा दास की झोपड़ी में ले गए। रानी को बहुत चोट आई थी। घायल होने पर भी रानी के मन में जो देश प्रेम की भावना थी, उनके चेहरे पर साफ झलक रही थी। बहुत गंभीर चोटों की वजह से उनकी मृत्यु हो गई। उनकी इच्छा के अनुसार फौरन उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। वह नहीं चाहती थी कि उनका पवित्र पार्थिव शरीर अंग्रेजों के हाथ में आए।

झांसी की रानी अपने साहस और वीरता के कारण देशवासियों के लिए एक आदर्श बन गई थी। युद्ध भूमि में उन्होंने जो साहस दिखाया आज भी उसकी चर्चा होती है। सभी उनकी वीरता की मिसाल देते हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान की ये पंक्तियां आज भी लोग उनकी याद में गाते हैं-

बुन्देले हरबोलों के मुख हमनें सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी।


इस तरह क्रांति की ज्योति जलाकर यह वीर नारी हमेशा के लिए अमर हो गई।


टिप्पणी पोस्ट करें (0)
नया पेज पुराने