पंजाब के रानी साहब कुंवरि । Punjab ki Rani Sahib kunwari history in Hindi

बहुत समय पहले भारत के पंजाब क्षेत्र में पटलिया एक राज्य था। भारत की उत्तरी सीमा में स्थित यह पंजाब सबसे बड़ी रियासत थी। जहां इसी वीरभूमि में साहब कुंवारी का जन्म हुआ था ‌। जब इनका जन्म हुआ मुगलों का सूर्यास्त होने की और था चारों तरफ मराठा लोगों की धाक बढ़ती जा रही थी।


पंजाब के  रानी साहब कुंवरि । Punjab ki Rani Sahib kunwari history in Hindi


साहब कुंवरी मैं स्त्रियों जैसे गुण तो थे ही, वीरता में वह किसी पुरुष से कम नहीं थी। वह बहुत योग्य और चतुर थी ‌‌। युद्ध कला से भी भली-भांति परिचय थी। इनका विवाह सरदार जयमल सिंह से हुआ था, जो बहुत ही भले पुरुष थे और मातृभूमि की रक्षा के लिए तन मन धन सदा न्यौछावर करने को तैयार रहते थे। साहब कुंवारी जैसी  पत्नी पाकर वह बहुत खुश थे ‌। उनका वैवाहिक जीवन सुख शांति से गुजर रहा था।


पटियाला में साहब कुंवरी के भाई का राज था। अपनी बहन की तरह न तो वह प्रजा को संभालने की योग्यता रखते थे और ना ही राजकाज सुचारू रूप से चलाना आता था। वह बहुत ही बिलासी तथा अलसी थे। इस कारण उनके कर्मचारी जनता पर मनमाना अत्याचार करते थे। प्रजा जुल्मों के कारण उनके विरुद्ध हो गई और राज्य विद्रोह फैल गया।


विद्रोह देखकर कुंवरी उसका दमन करने भाई के पास चली गई। भाई ने बड़ा स्वागत किया। उन्होंने आते ही बागडोर संभाल ली। सबसे पहले यह पता लगाया कि जनता का विद्रोह क्यों फैल गया है? इसलिए जो कुछ भी जनता के भले के लिए हो सकता था, किया गया। माल गुज़ारी और लगान में कमी कर दी गई और भी कई कार्य किए, जिससे जनता में सुख तथा शांति फैल सके, उन्होंने अपने अधिकारियों को सख़्त आज्ञा दे दी कि प्रजा पर किसी भी प्रकार का अत्याचार नहीं हो।


साहब कुंवरी के बंदोबस्त से राज्य की दशा बहुत सुधर गई और हर प्रकार से राज्य की उन्नति होती गई। प्रजा अमन -चैन से जीवन गुजारने लगी।


एक बार साहब कुंवरी के पति जयमल सिंह को उनके चचेरे भाई फतह सिंह ने कैद कर लिया और उनके सारे इलाकों पर अपना अधिकार जमा लिया। उस समय साहब कुंवारि अपनी सेना लेकर फतेहगढ़ पहुंची और फतह सिंह को हराकर अपने पति जयमल सिंह को उसकी कैद से आजाद कराया। सारे इलाके फिर से अपने अधिकार में ले लिए।


साहब कुंवरी ने पटियाला का राजकाज सुचारू रूप से करते हुए अपनी सेना भी मजबूत कर ली। सेना में और भी सिपाहियों की भर्ती की और उनको युद्ध कला में ऊंचाई पर पहुंचा दिया।


इसी समय मराठों ने पटियाला पर हमला कर दिया। उन्होंने सीख सरदारों की अधीन करके रियासत पटियाला को भी अपने कब्जे में करने का संदेश भेजें। मराठों ने समझा कि पटियाला का राजकाज तो एक स्त्री देख रही है। उसे वह आसानी से अपने काबू में कर लेंगे। वे लोग रानी साहब कुंवारि की शक्ति तथा बहादुरी से परिचित नहीं थे।


साहब कुंवरी ने कूटनीति से काम लिया। उन्होंने सभी हिंदू तथा सिख राजाओं का पत्र लिखा, जिसका आशय यह था मराठे उनकी स्वतंत्रता को छीनना चाहते हैं। यदि सभी राजा एकजुट हो जाए, तो वे हार जाएंगे और फिर उनकी भूमि की और पलटकर कभी नहीं देखेंगे। इस प्रयास में सभी राजा एकत्र हुए और विशाल सेना भी जमा हो गई।


मदीनपुर नामक स्थान पर सिखों तथा मराठों भयंकर युद्ध हुआ, पर सिख एक तो संख्या में कम थे, दूसरे युद्ध कला में भी कुछ कमी थी। सैनिक घबराकर पीठ दिखाने को ही थे कि साहब कुंवरि स्वयं हाथ में तलवार लेकर मैदान में कूद पड़ी। इससे उनकी सेना में उत्साह पैदा हो गया उन्होंने मराठों के छक्के छुड़ा दिए। जिस सेना की कमान रानी जैसी बिरंगाना के हाथ में हो, तो दुश्मन को हारना तय था। मराठे मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए। रानी की सेना के काफी सैनिक मारे गए, पर अंत में विजय उन्हीं के हाथ लगी।


1793 में फ्रांसीसी सेनापति जार्ज टामस अपनी पैदल सेना, घुड़सवार सेना तथा 50 तोपें लेकर सिख रियासतों पर चढ़ आया। हांसी तथा हिसार पर उसने पहले ही अधिकार कर लिया था। अव जींद को घेर लिया। सिखों की सेना टाॅमस के सेना पर टूट पड़ी। सिखों के पैर उखाड़ने लगे तभी रानी साहब कुंवारि अपने वीर सैनिक के साथ युद्ध भूमि में चली आई और घमासान युद्ध हुआ।


साहसी रानी साहब कुंवरि के रहते सिख सेना अपने को हौसले से भरा हुआ पाती थी। साहब कुंवरि के वीरता के आगे फ्रांसीसी सेना की एक न चली रानी की ही विजय हुई। सिख सेना ने टाॅमस को पीछे हटते देखा, तो उसका पीछा किया, उसी समय टाॅमस ने सिखों की सेना पर लौटकर गोली की बरसात कर दी, जिससे सीख सेना तितर-बितर हो गई और बहुत सारे सिख सैनिक मारे गए। अंत में सिखों को टाॅमस से संधि करनी पड़ी। टाॅमस पीछा करने वाली सेना में रानी साहब कुंवारी की सेना नहीं थी। शायद यही वजह थी की सिख सेना का साहस डावाडोल हो गया और उन्होंने समझौता करना पड़ा।


भारत में वीर रानी की धाक जम गई थी। उनके बहादुरी के चर्चे होने लगे । दुश्मन भी अनके साहस तथा वीरता से प्रभावित थे। साहब कुंवरि हर तरह से अपने भाई के राज काज में सहायता कर रही थी। उसने रियासत को सभी प्रकार से सुखी बना दिया था। इतना सब करने पर भी मानने के बजाए ऐसा व्यवहार किया, जिसकी कल्पना नहीं की थी।


भाई स्वयं तो किसी योग्य नहीं, वह केबल मतलबी और चालाक चाटूकारों के बीच घिरा रहता था। उसमें अपना भला बुरा सोचने की बुद्धि ही नहीं थी। उसके सबको ने उसे साहब कुंवरि के विरुद्ध पैसा भड़काया कि उसके मन में दरार पैदा हो गई। चापलूसों ने उसके मन में यह विचार भर दिया कि साहब कुंवरि सारा राज्य हड़पने का सपना देख रही है। अंत में उसे उसको राज्य से बाहर खदेड़ देगी। यहां तक कहा गया कि उनकी जान को भी भारी खतरा है।


रानी ने अपने भाई के मन की भावना भांप ली और अपनी रियासत में लौटकर रहने लगी। कहां पर है किला भी बनवाया, परंतु भाई के मन मैं इतना जहर भरा था कि रानी को वहां भी नहीं रहने दिया और किले को खाली कर अपने पति के पास जाने का आदेश दे दिया। वह रानी के प्रत्येक उपकार को भूल गया। रानी को अपने पति के पास जाने मैं कोई एतराज नहीं था, परंतु अपमान सहकार जाना उसके मन को स्वीकार नहीं था। इसलिए उसने पटियाला जाने का फैसला किया। उसके भरोसे को लोगों ने उसे बहुत समझाया कि राजा का व्यवहार उसके लिए ठीक नहीं है, उसे वहां नहीं जाना चाहिए, परंतु उनकी बात नहीं मानी तथा किले में फिर से चली गई और अपने भाई से युद्ध की तैयारी करने लगी।


राजा ने सोचा कि वह रानी के कौशल के आगे कुछ भी नहीं है। उसे जीत नहीं पाएगा। उसने रानी के पास संदेश भिजवाया कि वह पटियाला आकर रहें। उन्हें उसी आन बान के साथ रखा जाएगा। रानी अपने भाई की बातों में आ गई। भाई ने धोखे से बंदी बना लिया। कैद में रानी पर किसी प्रकार का अत्याचार नहीं किया गया पर गुलामी का जीवन रानी को स्वीकार नहीं था। वह नौकर का वेश बनाकर कैद से बाहर निकल गई और अपने पति के पास पहुंच गई। वहां अच्छी तरह रियासत का प्रबंध करती रही और सन 1799 मैं उस बहादुर नारी ने इस दुनिया से आंखें मूंद ली।

टिप्पणी पोस्ट करें (0)
नया पेज पुराने