सरस्वती पूजा 2021 में कब है। Basant Panchami 2020, Date, Puja Vidhi, Muhurat, Mantra,

कुछ विद्वानों के अनुसार पंचमी तिथि का प्रारंभ 29 जनवरी से हो रहा है तो इसलिए इसी दिन बसंत पंचमी मनाई जायेगी। तो वहीं कुछ के अनुसार 29 जनवरी को पंचमी तिथि का प्रारंभ सूर्योदय के एक प्रहर बाद हो रहा है जिस लिहाज से 30 जनवरी को सरस्वती पूजा करना ज्यादा श्रेष्ठ रहेगा।





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Saraswati Puja (Basant Panchami) 2020 Date, Puja Vidhi, Shubh Muhurat, Time, Samagri, Mantra: कुछ विद्वानों के अनुसार पंचमी तिथि का प्रारंभ 29 जनवरी से हो रहा है तो इसलिए इसी दिन बसंत पंचमी मनाई जायेगी। तो वहीं कुछ के अनुसार 29 जनवरी को पंचमी तिथि का प्रारंभ सूर्योदय के एक प्रहर बाद हो रहा है जिस लिहाज से 30 जनवरी को सरस्वती पूजा करना ज्यादा श्रेष्ठ रहेगा।


Saraswati Puja 2020 Date, Puja Vidhi: बसंत पञ्चमी सरस्वती पूजा मुहूर्त 10:45 ए एम से 12:34 पी एम तक। आज सरस्वती पूजा यानी बसंत पंचमी (Basant Panchami) का पर्व मनाया जा रहा है। वैसे तो पंचमी तिथि बुधवार सुबह 10.46 बजे से ही शुरू हो गई थी जोकि गुरुवार दोपहर 1.20 तक रहेगी। चूंकि सूर्योदय काल में पंचमी तिथि आज ही है इसलिए ज्यादातर लोग शास्त्रसम्मत आज ही मां सरस्वती की पूजा कर रहे हैं। मान्यता है कि वसंत पंचमी एक स्वयंसिद्धि मुहूर्त और अनसूज साया है यानी इस दिन कोई भी मांगलिक कार्य बिना पंचांग देखे किए जा सकते हैं। इस दिन शादी, भूमि पूजन, गृह प्रवेश, वाहन खरीदना, कारोबार शुरू करने जैसे कोई भी अच्छे कार्य किए जा सकते हैं…


Saraswati Puja 2020 Date in India, सरस्वती पूजा 2020 में कब है: ऐसी धार्मिक मान्यता है कि बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती का धरती पर आगमन हुआ था। भगवान कृष्ण ने सरस्वती मां से प्रसन्न होकर उनके जन्मदिवस को एक उत्सव की तरह मनाने का उन्हें वरदान दिया।



Saraswati Puja 2020 Date in India: यह त्योहार हर साल माघ शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है।


Saraswati Puja 2020 Date in India: माघ मास का हिंदू धर्म में काफी धार्मिक महत्व माना गया है। इस महीने में कई प्रमुख त्योहार पड़ते हैं जिनमें से एक है वसंत पंचमी का पर्व। यह त्योहार हर साल माघ शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। ये पर्व न सिर्फ भारत में बल्कि पड़ोसी देशों बांग्लादेश और नेपाल में भी मनाया जाता है। इस साल इस पर्व को 29 जनवरी को मनाया जा रहा है। जानिए इसका महत्व और पौराणिक इतिहास…



बसंत पंचमी के त्योहार का क्या है महत्व: ऐसी धार्मिक मान्यता है कि बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती का धरती पर आगमन हुआ था। भगवान कृष्ण ने सरस्वती मां से प्रसन्न होकर उनके जन्मदिवस को एक उत्सव की तरह मनाने का उन्हें वरदान दिया। ऐसा भी माना जाता है कि इस दिन कामदेव औक उनकी पत्नी रति धरती पर आकर प्रेम रस का संचार करते हैं। इसलिए इस दिन मां सरस्वती के साथ कामदेव और रति की पूजा भी की जाती है।



सरस्वती पूजा का इतिहास: सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्माजी ने मनुष्य योनि की रचना की, परंतु वह अपनी सर्जना से संतुष्ट नहीं थे, तब उन्होंने विष्णु जी से आज्ञा लेकर अपने कमंडल से जल को पृथ्वी पर छिड़क दिया, जिससे पृथ्वी पर कंपन होने लगा और एक अद्भुत शक्ति के रूप में चतुर्भुजी सुंदर स्त्री प्रकट हुई। जिनके एक हाथ में वीणा एवं दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। वहीं अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। जब इस देवी ने वीणा का मधुर नाद किया तो संसार के समस्त जीव-जंतुओं को वाणी प्राप्त हो गई, तब ब्रह्माजी ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा।



सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण वह संगीत की देवी भी हैं। वसंत पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से खुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी। इस कारण हिंदू धर्म में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है।



वसन्त पंचमी, सरस्वती पूजा, वसंत पंचमी कथा

   

वसन्त पंचमी उत्तर भारत का प्रसिद्ध त्योहार है। यह त्योहार हिन्दूओं का है, कुछ हिन्दू इस त्योहार को सरस्वती पूजा के नाम से जानते है। वसंत पंचमी को बसंत पंचमी भी कहा जाता है। यह एक ऐसा त्योहार है, जो वसंत के आगमन की प्रांरभिक तैयारियों को चिह्नित करता है। जो भारत में अलग अलग क्षेत्रों में विभिन्न तरीकों से मनाया जाता है। यह त्योहार माघ के महीने की शुक्ल पंचमी के दिन, प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है।


देवी सरस्वती को विद्य की देवी कहा जाता है। इस दिन सरस्वती की पूजा की जाती है, क्योंकि प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है। वसंत पंचमी त्योहार, देवी सरस्वती को समर्पित त्योहार है, जो ज्ञान, भाषा, संगीत और सभी कलाओं की देवी हैं। इस त्योहार पर महिलायें पीले रंग की कपड़े पहनती है, और पीले रंग के व्यंजन बनाती है। भारत में पूरे साल को छः मौसमों में बांटा जाता है जिसमें से वसंत सबका प्रिय मौसम होता है। इस महीने में, खेत सरसों के पीले रंग के फूलों से भर जाता है।



वसंत पंचमी को होली के त्योहार की तैयारी का प्रतीक भी माना जाता है, जो कि इसके 40 दिन बाद आती है। वसंत पंचमी में विष्णु और काम देव की पूजा भी की जाती है। शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है। पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से वसंत पंचमी का उल्लेख मिलता है। माँ सरस्वती की पूजा करने से अज्ञान भी ज्ञान की दीप जलाता हैं।



इस दिन लोग अपने घरों में पील रंग के व्यंजन बनाते है, कुछ पीले रंग के चावल बनाते है तो कुछ केसर का उपयोग करते है।


सरस्वती को वागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसन्त पंचमी के दिन को इनके प्रकटोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है-


प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।


अर्थात ये परम चेतना हैं। सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है।


वसंत पंचमी कथा

प्रारंभिक काल में, भगवान शिव की आज्ञा से ब्रह्मा जी ने जीवों और मनुष्य की रचना की थी। परन्तु ब्रह्मा जी अपने रचना से संतुष्ट नही थे। तो ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु की आराधना की, तब विष्णु से उनके समक्ष प्रकट हुए। ब्रह्मा जी ने अपनी समस्या विष्णु जी के सामने रखी परन्तु विष्णु जी के पास उनकी समस्या का हल नहीं था। इसलिए दोनों ने आदिशक्ति दुर्गा माता का आव्हान किया। तब दुर्गा माता प्रकट हुई और उनकी समस्या के हल के लिए अपने शरीर में से देवी सरस्वती को प्रकट किया। तभी से, सभी जीवों का वाणी प्राप्त हुई। इस प्रकार देवी सरस्वती का जन्म हुआ था।


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