अजीमुल्ला खां का जीवनी ! Azimullah Khan Biography in hindi

अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की योजना तैयार करने का श्रेय अजीमुल्ला खा है। 19वीं शताब्दी के आरंभ में कानपुर शहर विकासित हो रहा था। अंग्रेजों की छावनी के सैनिक जहां पैरेड करती थे, उस पैरेड मैदान के समीप पटकापुर में नजीब मिस्त्री रहते थे, जो अपने अथक परिश्रम से अपनी पत्नी मां और अपने लिए कमाकर कुछ बचा लेते थे। वे देश की राजनीति हलचल से अनजान, सरल और नमाज़ी थे। उनकी पत्नी करीमन अंग्रेज के उद्दण्ड व्यवहार से दुखी थे। उन्हीं के मोहल्ले के सेठ धनीराम को एक अंग्रेज ने केवल इसलिए बेहोश होकर गिरने तक पीट डाला की बेवक्त आने पर भी उसके लिए दूध क्यों नहीं बचा कर रखा। इस सबसे करीमन के मन में अंग्रेजों को प्रति घृणा पनप रही थी।



             सत्तावनी क्रांति का सूत्रधार



1857 का विद्रोह कहाँ से प्रारंभ हुआ था


सन 1820 के एक ठिठुरती रात में नजीब के घर एक बालक ने जन्म लिया। उसका नाम रखा गया अजीमुल्ला खां। नजीब उसे बहुत प्यार करते थे। काम से लौटने के बाद वही एक खिलौना था। अजीम को एक हाजी के घर उर्दू फारसी पढ़ने के लिए भेजा गया। एक बार नजीब को एक अंग्रेज ने अस्तबल साफ करने को कहा। मना करने पर उस अंग्रेज ने उन्हें छत से गिरा दिया और उन पर एक ईट फेंककर मारी, जिसके परिणामस्वरूप नजीब छः माह बिस्तर पर रहकर इस दुनिया से कुच कर गए। जमा पूंजी उनके इलाज पर खर्च हो गई थी। 


मां बेटे दोनों निर्धनता का जीवन बिताने को अभिशप्त हो गए। करीमन बेगम पत्थर परिश्रम कर अजीम का व अपना पेट भरतीं। वे बीमार रहने लगी। बालक अजीम ने पड़ोसी मानिकचंद्र से  कहकर एक अंग्रेज हिलर्सडेन के घर सफाई के काम की नौकरी पा ली। वहां हृदय व्यक्ति था। अजीम की प्रत्युत्पन्नमति और निर्भीकता से प्रभावित  था। उस समय अजीम की उम्र मात्रा 7 वर्ष के थे। 2 वर्ष के बाद करीमन बी भी संसार से कूच कर गई। अव अजीम हिलर्सडेन साहब के घर रहने लगा। काम करते हुए भी उनके बच्चे साथ इंग्लिश और फ्रेंच सीख लिया। हिलर्सडेन की सिफारिश से उस समय के कानपुर के एकमात्र स्कूल में दाखिला भी ले लिया। स्कूल की पढ़ाई समाप्त करने के बाद उन्ही हिलर्सडेन की सिफारिश और अपने योग्यता से अजीमुल्ला खां को उस स्कूल में नौकरी भी मिल गई।


स्कूल में नौकरी मिलने पर अपने घर आकर रहने लगे और उर्दू फारसी हिन्दी संस्कृत का अध्ययन करने लगे अध्यापक  थे मौलवी निसार अहमद और पंडित गजानन मिश्रा। अजीमुल्ला ने भारत की राजनीति आर्थिक व धार्मिक स्थिति व इतिहास का भी अध्ययन किया।


आप कानपुर में उनकी प्रसिद्धि वढ़ती जा रहे थी। उनके घर शाम को बैठक होने लगी। अजीमुल्ला बाहर से अंग्रेज़ी रंग में रंगे थे। लेकिन उनका अंतरंग देश को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाने के लिए छटपटा रहा था। शाम की बैठकों में उन्हें अपने समान अनुभव वाले लोग मिले।

कानपुर के समीप ही बिठूर में नाना साहेब थे, जो ईस्ट इंडिया कंपनी से मिलने वाली आठ लाख रुपयों वार्षिक पेंशन बंद हो जाने से परेशान थे। उनके दरबार में तात्या तोपे योद्धा तो थे, पर अच्छा सलाहकार नहीं था। अजीमुल्ला खां की प्रसिद्धि सुनकर उन्होंने उन्हें अपने दरबार में बुलवाया। आश्वस्त हो जाने पर, कि वे अंग्रेज भक्त नहीं देशभक्त है, अपना सलाहकार नियुक्त कर लिया, फिर कुछ समय बाद मंत्री बना लिया। अजीमुल्ला खान ने कहा घुड़सवारी और युद्ध विद्या सीखी और नाना साहेब की पेंशन की अर्जी लेकर इंग्लैंड पहुंचे। वहां उनकी भेंट सतारा के रंगोली बापू से हुई, जो सतारा के राजा की ओर से राज्य का दावा पेश करने आए थे। दावा खारिज हो जाने पर निराश और उदास थे। 


अजीमुल्ला का जान गए थे कि उनकी अर्जी भी खारिज होने वाली है। उन्होंने रंगोली बापू से कहा कि अंग्रेज के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति की आवश्यकता है, इसके लिए कोई ठोस योजना बनानी चाहिए। इसमें राजा महाराजा ही नहीं जनता का भी सहयोग चाहिए। जो राजा और जमीदार अंग्रेजों के अन्याय के शिकार हुए हैं, वे अपनी जनता को अंग्रेजों के विरुद्ध तैयार कर सकते हैं। मैंने कहा‌ , (हम दोनों दक्षिण भारत में और मैं उत्तर भारत में क्रांति की आग फूकते हैं)। वापसी में वे यूरोप के कुछ देशों और रूस होते हुए लौटे। रूस के जार ने आश्वासन दिया की क्रांति की तिथि निर्धारित होने पर, सूचना मिलते ही वे सीमा पर जा डटेंगे।


बिठूर लौटकर अजीमुल्ला खां ने नाना साहेब को तैयार किया। उन्हें अपने योजना बताई। तीर्थाटन के बहाने नाना साहेब अपने कुछ सैनिकों और अजीमुल्ला खां को लेकर समस्त राजा राजबाड़ों से मिले। उन्हें इसके लिए तैयार किया। साधू सन्यासियों के वेश में गुप्तचर जनता के बीच पहुंचे। अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय सेनाओं को संगठित करने के लिए लाल कमल प्रतीक के रूप में चुना गया। एक सैनिक एक लाल कमल को लेकर किसी सेना में प्रवेश करता। क्रांति के लिए तैयार समर्थक सैनिक उस कमल को हाथ में लेकर उसकी प्रशंसा करते।


जनता को संगठित करने का कार्य रोटी से लिया गया। एक व्यक्ति रोटी लेकर गांव में पहुंचाता। उस गांव का मुखिया रोटियां बना कर अपने व्यक्ति के हाथ दूसरे गांव भेजता। इस प्रकार नानासाहेब पेशवा ने रोटी और कमल के द्वारा क्रांति का गठन किया।



1857 के विद्रोह के नेताओं - Leaders of the Revolt of 1857


नाना साहेब झांसी की रानी, अवध की बेगम हजरत महल और दिल्ली के बादशाह जफर से मिले। झांसी की रानी और बेगम हजरत महल तो मानो तैयार ही बैठी थी। जफर को समझाने में थोड़ी देर लगी। दूर राज्यों में दूत भेजा गए। 31 मई 1857 क्रांति के आरंभ का दिन निश्चित किया गया।


सब कुछ योजनाबद्ध था। अजीमुल्ला खां और नाना साहेब की क्रांति में जोश ही नहीं, होश भी था। परंतु दुर्दैव से मेरठ की छावनी में क्रांति का आरंभ 29 मार्च को हो गया। मंगल पांडे का असन्तोष भड़क उठा और उन्होंने उसी दिन विद्रोह कर दिए। मंगल पांडे अपना देश को अत्याचार से नहीं देख पाए। मेहनत फलीभूत नहीं हो सकी।


कानपुर के युद्ध में अंग्रेज हारे। नाना साहेब का राज भी कुछ समय के लिए स्थापित हो गया। लेकिन अंततोगत्वा नाना साहेब को हार कर नेपाल की तराई में चले जाना पड़ा। महारानी तपस्विनी भी वहीं पहुंची। अजीमुल्ला खां कानपुर के पास हरियाणा में लड़ते हुए मारे गए। समस्त भारत को अंग्रेजों के विरुद्ध संगठित करने का प्रथम प्रयास और श्रेया भी उन्हें दोनों को जाता है।


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