पन्ना धाय की कहानी | panna dhai kahani, story in hindi

मेवाड़ में महाराणा संग्राम सिंह का राज था। वह हमेशा जनता का भला चाहने वाले प्रतापी राजा थे। उनके बड़े पुत्र का नाम विक्रमादित्य था। वह अनेक बुरी आदतों का शिकार था। उसमें पिता का एक भी गुण नहीं था। वह बड़ा ही अत्याचारी भी था।


पन्ना धाय का त्याग की कहानी | panna dhai kahani, story in hindi

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पन्नाधाय की इसमें सभी टॉपिक है , आइए जानते हैं

  1. पन्नाधाय कौन थी
  2. पन्नाधाय की कथा
  3. पन्नाधाय उदयसिंह की कथा
  4. महाराणा उदय सिंह के कितने भाई थे?
  5. उदय सिंह के पिता कौन थे?
  6. उदय सिंह किसका पुत्र था?
  7. पन्नाधाय इतिहास में क्यों प्रसिद्ध है


महाराणा संग्राम सिंह का बहुत ही कम उम्र में देहांत हो गया था। उनके बाद उनका पुत्र विक्रमादित्य राज्य संभालने लगा, परंतु उसे प्रजा अपना राजा मानने को तैयार नहीं थी, क्योंकि वह बहुत जालिम था। अन्त प्रजा ने उसे गद्दी से उतरवा के ही दम लिया। तब उसके छोटे भाई उदयसिंह को राजा बनाया गया। उस समय उदयसिंह की उम्र सिर्फ 6 साल की । देखभाल के लिए पन्ना नामक युवती को रखा गया।


पन्ना एक राजपूतानी स्त्री थी। देश प्रेम के साथ साथ उसमें वफादारी कूट-कूट कर भरी हुई थी। वह आदत से सरल तथा कोमल ह्रदय वाली थी। अपने कर्तव्य पर मर मिटना उसे खूब आता था। वह बंदूक भी चला सकती थी, जो उसने अपने पिता, जो एक वीर सिपाही थे, उनसे सीखी थी। दिल की दिलेर होने पर भी वह खून खराबे से दूर रहती थी। किसी को भी दुख देना या जुल्म माना वह ठीक नहीं समझती थी।


पन्ना उदयसिंह का पालन करने वाली दाई मां थी, इस कारण पन्नाधाय नाम से जानी जाती थी। वह उदय सिंह की देखभाल, पालन पोषण बहुत ही लाड़- प्यार से करती थी। उसका पुत्र भी उदय सिंह के ही उम्र का था, परंतु वह अपने पुत्रों से अधिक ध्यान से राजा उदय सिंह की रेख- देख करती थी। उसकी पूरी कोशिश थी कि वह उदयसिंह में एक अच्छे राजा के सभी गुणों का विकास कर सके।


राजा बनते समय उदय सिंह की आयु बहुत कम थी, इसलिए बहा राज्य का कार्य संभालने योग्य नहीं थे, अतः बनवीर के संरक्षण में उदय सिंह को रखा गया। बनवीर बहुत ही चालाक था। वह होने वाले राजा की देख रेख करते-करते स्वयं को राजा समझने लगा था और राजा बनने के सपने देखने लगा था। सपने को साकार करने में एक बाधा थी, वह थे उदय सिंह। इस कारण बनवीर को उदय सिंह जरा भी पसंद नहीं थे। बहुत सोचा करता था कि उसकी आंख के कांटे उदय सिंह को मृत्यु हो जाए, तो वह राजा बन सकता है, अतः वह उसने अपने रास्ते से हटाने की योजनाएं बनाने लगा।


एक रात बनवीर गुप्त ढंग से नंगी तलवार लेकर राजमहल में गया और सोते में ही विक्रमादित्य की हत्या कर दी। उसके बाद वह राजा उदय सिंह को महल में दौड़ता हुआ उनके कमरे के ओर बढ़ा । इस बीच कर्मचारियों ने पन्ना को इस बात की खबर कर दी कि बनवीर उदयसिंह को मारने के लिए आ रहा है। पन्ना सावधान हो गई और उसने अपने दिमाग से काम लिया। अपने पुत्रों को उदय सिंह के कपड़े आदि पहनाकर उसके स्थान पर लिटा दिया और उदयसिंह को अपने भरोसे के एक सिपाही के साथ वीरा नदी के पार भिजवा दिया और बही इंतजार करने के लिए कहा।


राजवंश को बचाने के लिए ही उसने यह बात सोची और अपने पुत्र तक का बलिदान करने को तैयार हो गई। इसी समय बनवीर नंगी तलवार लेकर उदयसिंह के कमरे में आया पन्ना से पूछा कि उदय सिंह कहां है? पन्ना एक क्षण के लिए दुख से घबरा गई, परंतु फौरन उसने अपने पर काबू कर लिया और पलंग की ओर इशारा कर दिया, जहां उसका अपना पुत्र सोया था। पुत्र का मुख दूसरी दिशा में था। बनवीर पर तो जैसे खून सवार था, उसने कपड़े गहने देखते ही तलवार से उसके टुकड़े कर दिए।


पन्ना धाय का त्याग की कहानी | panna dhai kahani, story in hindi


पन्ना ने दिल दहला देने वाली दृश्य को देखकर मुंह से आह तक नहीं निकली , वरना बनवीर को शक हो जाता। अपने सामने अपने पुत्र के टुकड़े होते देख कर कौन मां तसल्ली रख सकती है, लेकिन पन्ना ने स्वामिभक्ति तथा धीरज के परीक्षा पास कर ली। बनवीर ने पन्ना के पुत्र के टुकड़े-टुकड़े करके कह दिया, जाओ इसे जला दो। और वह मन ही मन खुश हुआ कि उसकी रहा का कांटा दूर हो गया। पन्ना दिल पर पत्थर रखकर सब देखती सुनते रही। उसके बाद महल से बाहर आकर उसने अपने बेटे का अंतिम संस्कार किया। उसने राजवंश की रक्षा के लिए अपने बेटे को मरवा डाला। बेटे का अंतिम संस्कार करके वह नदी पर पहुंच गई। वहां से उदय सिंह को लेकर अनेक स्थानों पर उस भावी राजा की सुरक्षा के लिए गई, परंतु बनवीर के डर से कोई भी उसे सहारा देने को तैयार ना हुआ। पन्ना निराश हो गई, उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें


पन्ना उदय सिंह को लेकर एक सरदार आशा शाह के पास गई और उसे उदय सिंह को अपने पास रखने के लिए निवेदन किया। आशा शाह भी दुविधा में था कि वह उदय सिंह को रखे या न रखे। वह भी बनवीर के कारण डरा हुआ था। आशा शाह की माता ने उसे डाटा और महाराणा संग्राम सिंह के नमक का हवाला देकर कहा कि जिस राना के उपकारों से हम लोग दबे हुए हैं, आज तुम उन्ही के पुत्र को ठुकरा कर देशद्रोह का सबूत दे रहे हो। उसकी मां ने नाराज होकर उन्हें अनके धर्म से परिचित कराते हुए कहां, ॥ जन्मभूमि की स्वतन्त्रता के लिए जीत वंश ने अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। उसी कुल के भावी राजा उदयसिंह को तुम ठुकरा रहे हो, तुम्हें तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए ॥


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माता के इस प्रकार के शब्दों को सुनकर आशा शाह के अंतरात्मा उन्हें धिक्कारने लगी। मां की बातें का प्रभाव उन पर पड़ा। उन्होंने अपने तलवार मां के पैरों में रखकर वचन दिया कि जब तक उनके शरीर में प्राण है, वह कुमार उदय सिंह की रक्षा करेंगे और उन्होंने अपने बच्न का पालन भी किया।


उदय सिंह की देख-भाल आशा शाह राजपुत्र की तरह करने लगे। वह उसकी सब सुख सुविधाओं का ध्यान रखते थे। उदय सिंह उनकी संगत में बड़े हो रहे थे। आशा शाह एक वीर सिपाही थे, अतः उन्होंने वे सभी विद्याएं उदय सिंह को सिखाई, जो एक राजा के लिए जाननी जरूरी थी।


जब तक कुमार उदय सिंह 16 वर्षों के हुए, चित्तौड़ के प्रजा को पता लग गया कि उदय सिंह जिंदा है। वह यह जानकर बहुत खुश हुई। प्रजा बनवीर के अत्याचारों से बहुत दुखी थी। उसके बुरे व्यवहार के कारण प्रजा या सरदार कोई भी उसके साथ नहीं था, जिसके वजह से उसे राजगद्दी से आसानी से हटा दिया गया। उन्हें अपने मन का राजा मिल रहा था। प्रजा तथा सरदारों ने मिलकर धूमधाम से उदयसिंह को चित्तौड़ लाकर गद्दी पर बैठाया। उदयसिंह बहुत अच्छी तरह राज्य करने लगे। अपने पिता की ही तरह वह भी बड़े कुशल राजा साबित हुए। वे प्रजा की सुख सुविधाओं का बहुत ध्यान रखते थे। इसलिए प्रजा के प्रिय हुए।


राजा उदय सिंह का राजतिलक बड़े धूमधाम से मनाया गया। उस समय पन्ना का भी राजसी सम्मान किया गया। पन्ना धाय के ही बलिदान का नतीजा था, जो चित्तौड़ वासियों को अपना राजा प्राप्त हुआ था। राजा उदय सिंह भी पन्ना को बहुत सम्मान देते थे। हर सुबह पन्ना के चरणों की धूल लेकर राजकाज शुरू करते थे और उन्हें अपनी माता के समान ही सम्मान देते थे। वह पन्ना की इच्छा का पालन करने में थोड़ी भी भूल नहीं करते थे और उनकी हर इच्छा को भगवान की इच्छा मानते थे। वह पन्ना के बलिदान को भूल नहीं पाए। इसलिए जब तक पन्ना जीवित रही, उनके राज्य में सम्मान से रही। सारी प्रजा बलिदान की उस देवी का दिल से सम्मान करती थी।



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