खुदीराम बोस का जीवन परिचय । Khudiram Bose Biography and Life Story in hindi

क्रांतिकारी खुदीराम बोस की उम्र उस समय मजह 19 साल की थी जब उन्होंने आज के रोज 11 अगस्त 1908 हिंदुस्तान की आजादी की खातिर फांसी को गले लगा लिया था. भारत की आजादी के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाले सैकड़ों साहसिक क्रांतिकारियों में एक नाम खुदीराम बोस भी है.  जानते हैं उनके बारे में...


खुदीराम बोस का जीवन परिचय । Khudiram Bose Biography and Life Story in hindi

बीसवीं सदी का पहला हीरो
खुदीराम बोस




खुदीराम की जीवन परिचय में यह सभ तौफीक एक एक कर शामिल किया गया है आइए आज जानते हैं



खुदीराम बोस को फांसी क्यों दी गई?


खुदीराम बोस को फांसी कब हुई?


खुदीराम बोस का जन्म कहाँ हुआ था?


खुदीराम बोस के वकील कौन थे


खुदीराम बोस बलिदान दिवस


खुदीराम बोस पर निबंध


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खुदीराम बोस का  प्रारंभिक जीवन परिचय


अमर बलिदानी खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर मंगलवार 1889 को ग्राम हबीबपुर, जिला मिदनापुर (पश्चिम बंगाल) मैं हुआ था। उनके पिता का नाम त्रिलोक्यनाथ बोस था। उन्होंने कुल नबी कक्षा तक की शिक्षा प्राप्त किए थे। स्वदेशी आंदोलन मैं भाग लेने के कारण उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी। किसी से वे भय मानते ही नहीं थे। दैव का दूर्योंग ऐसा कि बचपन में ही वे अनाथ हो गए। उनकी बड़ी बहन अपरूपा देवी के अलावा अब उनका दुनिया में कोई सगा सम्बन्धी न रहा। उनकी बड़ी बहिन ने ही उनकी देखभाल की। उसके भी कई बच्चे थे। अत: खुदीराम को बोर्डिंग हाउस में रहना पड़ा ।



खुदीराम बोस का क्रांतिकारी जीवन 


मिदनापुर में 1 अप्रैल 1906 को एक औद्योगिक प्रदर्शनी का उद्खाटन जिलाधीश के हाथों हुआ। जिलाधीश की जय ! के बीच वंदे मातरम ! कि नारा भी सुना गया। उन दिनों वंदे मातरम का क्रांतिकारी नारा लगाना अपराध था। इस मेले की समाप्ति पर वहां एक क्रांतिकारी पर्चा भी बाटा गया था, जिसमें अंग्रेजों को खूब खरी - खोटी सुनाई गई थी।



उपायुक्त घटना के पूर्व 28 फरवरी 1906 को खुदीराम कुछ क्रांतिकारी पर्चे बांट रहे थे कि उन्हें एक पुलिस के सिपाही ने पकड़ लिया। वह उन्हें पुलिस चौकी ले जाने लगा। इनके इनकार करने पर उसने उन्हें घसीटना चाहा। मगर इस 15 वर्षीय वीर ने उससे अपना हाथ छुड़ा लिया और उसके गाल पर तमाचा रसीद किया और खुदीराम वहां से नौ दो ग्यारह हो गए। फलत: उस सिपाही को दिन में तारे तो दिखाई दिए , लेकिन खुदीराम कहीं दिखाई न दिए। वस्तुत: खुदीराम का जीवन बड़ा ही नाटकीय एवं घटनाप्रधान रहा है। यथार्थत: वे क्रांतिकारी कार्य के लिए ही पैदा हुए थे।



पुलिस ने 31 मई, 1906 को खुदीराम को हॉस्टल से रात के 1:00 बजे उस समय गिरफ्तार किया, जबकि वे सो रहे थे। उन्हें गिरफ्तार करने के लिए एक सब इंस्पेक्टर और 10 सिपाही गए थे। उन्हें हवालात में बंद कर दिया गया। इस प्रकार उन्हें 15 वर्ष की आयु में ही पता चल गया था कि हवालात क्या चीज होती है।



खुदीराम पर धारा 124 ए क्रिमिनल कोड के अंतर्गत मुकदमा भी चलाया गया। पुलिस ने बताया कि खुदीराम बॉस एक खतरनाक क्रांतिकारी बालक है, और वह सरकार के प्रति क्रांतिकारी वंदे मातरम के पर्चे बांटकर घृणा फैला रहे हैं। परंतु खुदीराम के नाबालिक होने के कारण यह मुकदमा उन पर चल नहीं सका और उन्हें रिहा कर दिया गया।



लार्ड कर्जन ने बंगालियों की भावना के विरुद्ध 1905 में बंगाल के दो टुकड़े कर दिए। इसका डट कर विरोध किया गया। अंग्रेजी ने डट कर दमन भी किया। पर आखिर में देशभक्तों की कुर्बानी के सामने शासन को झुकना पड़ा और सन 1911 ही में दोनों बंगाल फिर एक कर दिए गए। इसे दमन के चक्र के जमाने में किंग्सफोर्ड 3 अगस्त 1904 मैं कोलकाता का मुख्य मजिस्ट्रेट बन कर आया। यह बहुत जालिम मजिस्ट्रेट था। इस दमन का जवाब बंगाली जनता में बम और गोलियों से दिया। सन 1905 में ही बंगाल में क्रांतिकारी पार्टियों ने जन्म लेना शुरू कर दिया था और उन्होंने अंग्रेज द्वारा किए गए आतंक का उत्तर आतंक से ही दिया।



किंग्जफोर्ड को मारने की योजना 


किंग्सफोर्ड जैसे अन्यायी चीफ मजिस्ट्रेट के लिए कोलकाता में और ज्यादा दिन रहना खतरे से खाली नहीं था। इसलिए उसकी सुरक्षा के लिए 28 मार्च 1908 को उसका तबादला मुजफ्फरपुर (बिहार) कर दिया गया और मुजफ्फरपुर का सेशन्स जज बना दिया गया। क्रांतिकारी जब उसे कोलकाता में खत्म ना कर सके, तब उन्होंने उसे मुजफ्फरपुर जाकर खत्म करने की योजना बनाई।



उसे मारने के लिए दो नवयुवकों का चयन किया गया। ये नवयुवक थे वीर खुदीराम बोस और परम सांसे : प्रफुल्ल कुमार चाकी: । यह दोनों नवयुवकों को आवश्यक सामग्री सामान देकर मुजफ्फरपुर भेजा गया, जहां यह दोनों एक धर्मशाला में ठहरे। यहां उनका काम किंग्सफोर्ड की गतिविधियों पर नजर रखना था। वे अप्रैल 1908 के तीसरे हफ्ते के अंत में मुजफ्फरपुर पहुंचे थे।



कचहरी के सिवा किंग्सफोर्ड अपने बंगले के बाहर बहुत ही कम जाता था। उसकी रक्षा के लिए दो शस्त्र सिपाही हमेशा साथ रहते थे। दोनों नवयुवकों ने उसे रात में यूरोपियन क्लब में जाते देखा तो उन्होंने यह समझ लिया कि जाते जाते समय ही उस पर आक्रमण किया जा सकता है। उन्होंने यह भी देखा कि किंग्सफोर्ड एक घोड़ा गाड़ी में बैठ कर क्लब जाया करता था। उस घोड़ागाड़ी को उन्होंने अच्छी तरह से पहचान लिया। पर उन्हें यह नहीं मालूम हो सका कि उसी रांची घोड़ा गाड़ी सरकारी वकील मिस्टर कैनेडी के पास भी है।



30 अप्रैल 1908 को रात के 8 बजे खुदीराम बोस और प्रफुल्ल यूरोपियन क्लब जा पहुंचे और अपने शिकार की तलाश में एक पेड़ की आड़ में खड़े हो गए। रात के लगभग 8 बजे एक घोड़ा गाड़ी क्लब के बाहर आती दिखाई दी। वह गाड़ी कैनेडी परिवार की थी, जिस पर उसकी औरत और उसकी एक लड़की बैठी थी। पर खुदीराम ने इस किंग्सफोर्ड की ही गाड़ी समझा उसी पर अपना बम चला दीया। गाड़ी नष्ट हो गई और दोनों महिला जान से मारी गई। घोड़ा और गाड़ीवान भी घायल हुए। बम बड़ा भयानक था, और वह एक जोरदार धमाके के साथ फूटा था। इन लोगों के पास तीन पिस्तौल भी थी। अगर बम ना फूटता, उन्होंने पिस्तौल का इस्तेमाल किया होता। बम के फूटते ही यह दोनों युवक वहां से विरुद्ध दिशाओं में भागे। चाकी समस्तीपुर स्टेशन की और भागे तो खुदीराम बोस बेनीपुर स्टेशन की ओर भागते चले गए।



पुलिस द्वारा पकड़ लिया जाने पर चाकी ने 1 मई 1908 अपनी ही गोली से अपनी आहुति दे दी। खुदीराम रात भर की 24 से 25 मील पैदल यात्रा के पश्चात बहुत थक गए थे। वो भूखे प्यासे भी थे। उन का हूलिया एकदम बिगड़ा हुआ था।



खुदीराम बोस का गिरफ्तारी - Khudiram Bose Arrest


उनके चेहरे ही से उनकी परेशानी जाहिर हो रही थी। बोने गांव बोने स्टेशन के करीब ही था। खुदीराम का विचार हुआ पहले कुछ चाय नाश्ता कर लिया जाए, उसके बाद ही स्टेशन जाया जाए। वह चाय नाश्ता करने एक दुकान पर पहुंचे। ब वही पर पुलिस के दो सिपाही फतेह सिंह और शिव प्रसाद सिंह खड़े थे। उन्हें विगत रात में मुजफ्फरपुर में हुई घटना का भी पता था क्योंकि उन्हें वहीं से भेजा गया था। उन्हें खुदीराम का हुलिया देखकर इन पर शक हुआ। उन्होंने खुदीराम को पकड़ लिया और उसका नाम धाम और काम पूछा, पर उनके उत्तर से वे संतुष्ट नहीं हुए। वे खुदीराम को पकड़कर पुलिस चौकी ले गए। वहां पर उनकी तलाशी ली गई तो उनके पास दो रिवाल्वर मिले। एक खाली और दूसरा भरा हुआ था। 37 कारतूस मिले 30 रुपए और रेलवे टाइम टेबल की कतरन के साथ रेलवे का नक्शा भी मिला।


पुलिस को अव निश्चय पूर्वक मालूम हो गया कि हो न हो खुदीराम ही वह नवयुवक है। पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर मुजफ्फरपुर में ले गई।



अब तक खुदीराम को इस बात का पता लग चुका था कि उनके बम का शिकार जालिम किंग्सफोर्ड न होकर कैनेडी परिवार की दो निर्दोष महिला हो गई है। उन्हें इसका बहुत दुख हुआ। परंतु तीर तो छूट चुका था, अब वह लौट कर वापस निशाने पर आने वाला तो था नहीं। उन्होंने जब मुजफ्फरपुर में मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, तब उन्होंने अपना अपराध निर्भरता पूर्वक स्वीकार कर लिया। उन्होंने अपने बयान में कहा कि वह तो निर्दयी था अत्याचारी किंग्सफोर्ड को ही मारने गए थे, कैनेडी परिवार की दो निर्दोष महिलाओं की हत्या करना उसका उद्देश्य नहीं था। परंतु खुदीराम के इस अफसोस ने उनकी कोई मदद नहीं की। इतना लाभ जरूर मिला कि उनके द्वारा अपराध स्वीकार कर लिया जाने पर यह मुकदमा केवल दस बारह दिन ही चला और उसका निश्चित परिणाम सामने आ गया। शासन के भय और आतंक के कारण शिवाय वकील कालिदास बॉस के और किसी वकील ने आगे आने की हिम्मत ना की। जितने दिनों तक खुदीराम जेल में रहे उन्हें वहां बहुत कष्ट दिया गया।



खुदीराम बोस को फांसी - Khudiram Bose Death


21 मई 1908 को खुदीराम का मुकदमा मुजफ्फरपुर के मजिस्ट्रेट के सामने पेश हुआ। उसने केस की सुनवाई कर और खुदीराम का अपराध स्वीकृति बयान लेकर 25 मई को ही केस सेशन्स कोर्ट में भेज दिया। सेशन्स कोर्ट ने 8 जून को केस की सुनवाई की। यह भी खुदीराम ने निर्भय होकर, केस के परिणाम को भलीभांति समझते हुए, अपना अपराध स्वीकार कर लिया। 31 जून को जज ने खुदीराम बोस की सजा सुना दी।



6 जुलाई 1960 को हाईकोर्ट में खुदीराम की अपील उनके वकील ने भेजी जिसकी सुनवाई 13 जुलाई को हुई। इस अपील में खुदीराम की फांसी सजा बहाल रखी गई, हालांकि खुदीराम की उम्र अभी पूरे 18 वर्ष की भी नहीं थी। फांसी के दिन तक उनका वजन 2 पाउंड बढ़ गया था। उन्होंने 11 अगस्त 1960 को प्रात: 6 बजे मुजफ्फरपुर की जेल में फांसी पर लटका दिया गया।



खुदीराम बोस बलिदान के लिए सम्मान - Khudiram Bose For The Sacrifice Song


उनको फांसी दिए जाने की खबर सुनकर प्रात काल से ही जल के फाटक के बाहर भीड़ इकट्ठा होने लगी थी। जनता ने खुदीराम की शव यात्रा जोश के साथ निकाली और गंडक नदी के तट पर उनके वकील श्री कालिदास मुखर्जी ने उनकी चिता में आग लगाई। चिता की आग धूं धूं करके प्रज्वलित हुई। जिसकी चिंगारियां सारे भारत में फैल गई। चिता के मम्मी को लोगों ने अपने माथे पर लगाया। उसकी पुड़िया बांधकर वे घर में ले गए।



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