नाना साहेब का जीवनी । Nana saheb History and biography in hindi

अंग्रेज एक एक कर सभी भारतीय राज्यों को हड़पने की योजना बना रहे थे। बिठूर के राजा नाना साहेब की पेंशन भी उनके धर्म पिता बाजीराव पेशवा की मृत्यु के पश्चात अंग्रेजों ने बंद कर दी थी।


नाना साहेब का जीवनी  । Nana saheb History and  biography in hindi
नाना साहेब का जीवनी 


नानासाहेब पेशवा का यह सभी टॉपिक एक एक करके सभी विस्तार से बताया गया है जन्म से लेकर 18 57 की क्रांतिकारी बहुत कुछ। आइए जानते हैं


1) नाना साहेब का जन्म कब हुआ था,When was Nana Saheb born,


2) नाना साहब के माता पिता का नाम : Nana Saheb's parents name


3) नाना साहब कहां के रहने वाले थे : Where did nana sahib live


4) नाना साहेब की मृत्यु कब हुई : When did nana saheb die



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नाना साहेब का जीवनी  : Nana saheb biography


जन्म - 19 मई, 1824


जन्म भूमि - वेणुग्राम, महाराष्ट्र


मृत्यु तिथि - 6 अक्टूबर, 1858

मृत्यु स्थान अनिश्चित


पिता/माता पिता - माधवनारायण भट्ट

माता - गंगाबाई


पालक पिता-  बाजीराव द्वितीय


प्रसिद्धि पेशवा, स्वतंत्रता सेनानी

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Nana saheb ka jivan parichay : नाना साहेब का जीवन परिचय


नाना साहब (अंग्रेज़ी: Nana Saheb, जन्म- 19 मई, 1824, वेणुग्राम, महाराष्ट्र; मृत्यु- 6 अक्टूबर, 1858) सन 1857 के भारतीय स्वतन्त्रता के प्रथम संग्राम के शिल्पकार थे। उनका मूल नाम 'धोंडूपंत' था। स्वतंत्रता संग्राम में नाना साहेब ने कानपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोहियों का नेतृत्व किया। पेशवा बाजीराव बल्लाल भट्ट द्वितीय ने नाना साहब को गोद ले लिया था। इतिहास में नाना साहेब को बालाजी बाजीराव के नाम से भी संबोधित किया गया है। 1 जुलाई 1857 को जब कानपुर से अंग्रेजों ने प्रस्थान किया तो नाना साहब ने पूर्ण् स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी तथा पेशवा की उपाधि भी धारण की। नाना साहब का अदम्य साहस कभी भी कम नहीं हुआ और उन्होंने क्रांतिकारी सेनाओं का बराबर नेतृत्व किया।


बिठूर के शासक बाजीराव पेशवा पुना के राजा थे। अंग्रेजों ने उनके राज सिंहासन छीन लिया और उनसे कहा, राज्य सिंहासन छीन जाने के बदले में उन्हें आठ लाख रुपए वार्षिक की पेंशन मिल सकती है। अभागा बाजीराव पेशवा बिठूर मैं आकर रहने लगा और कंपनी से मिलने वाली आठ लाख रुपयें की वार्षिक के पेंशन से गुजारा करने लगे। बाजीराव के साथ उनके नौकर चाकरों के अतिरिक्त अन्य अनेक लोग बिठूर में आ बसे थे। उन्हीं में से एक माधवराव थे।


बाजीराव नि: सन्तान थे। उनकी नजर माधवराव के तिन वर्षीय पुत्र पर पड़ी। माधवराम से उन्होंने उनके इस पुत्र धोड़ोपंत को लेने की इच्छा जाहिर की। माधवराव ने खुशी खुशी बालक बाजीराव को सौंप दिया। यही बालक नाना साहेब धोड़ोपंत बाजीराव का दत्तक पुत्र था। 1951 में बाजीराव का देहांत हो गया। देहांत का समाचार मिलते ही अंग्रेज सरकार ने घोषणा कर दी कि बाजीराव को मिलने वाली आठ लाख रुपये की वार्षिक पेंशन नाना साहेब को नहीं मिलेगी।


नाना साहेब ईस्ट इंडिया कंपनी से मिलने वाले आठ लाख रुपये की वार्षिक पेंशन बंद हो जाने से बहुत अधिक परेशान थे। अंग्रेजों के इस विश्वासघात के लिए क्या करें, यह सोच नहीं पा रहे थे। उनके दरबार में तात्या तोपे, बालासाहेब जैसे कुशल योद्धा तो थे, लेकिन सही  मार्गदर्शन करने वाला कोई कुशल व्यक्ति नहीं था। आखिर अजीमुल्ला खां की विद्वत्ता, कुशलता और देशभक्ति की भावना की जानकारी उन्हें मिली। उनका मन इनसे मिलने को बेचैन हो उठा और एक दिन उन्होंने अपना एक विशेष दूत अपने छोटे से पत्र के साथ अजीमुल्ला खां के पास भेज दिए। अजीमुल्ला का कानपुर के स्कूल में अध्यापक थे। नाना साहेब ने उन्हें अपना सलाहकार नियुक्त किया। 


धीरे धीरे नाना साहेब के मंत्री का पद संभलने लगे। उन्हें रहने के लिए एक भव्य भवन दिया गया। वहां उन्हें युद्ध कला और घुड़सवारी सीखी। ईस्ट इंडिया कंपनी से पेंशन के विषय में पत्र व्यवहार किया। अजमेर लाखा का कहना था कि ,इंग्लैंड जाकर स्वयं ही ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों से बात की जाए। नाना साहेब इसके लिए तैयार हो गए। उन्होंने पेंशन का दावा पेश करने के लिए अजीमुल्ला खां को इंग्लैंड भेजा गया। अजीमुल्ला खां ने स्वय पत्र तैयार किया और नाना साहेब के हस्ताक्षर व मूहर के साथ नवाबी ठाठ बाट से इंग्लैंड पहुंचे।। बहा उन्हें दोनों रंगोजी बापू गुप्ते सतारा के राज्य का दावा पेश करने आए हुए थे। दोनों के दावे अमान्य हो गए, तो अजीमुल्ला खां ने रंगोजी बापू गुप्ते के समझ सशस्त्र क्रांति की योजना रखी।


वापस लौटकर अजीमुल्ला खा ने विस्तार से नाना साहिब के समक्ष भी अपनी क्रांति की योजना रखी। नाना साहेब इस योजना को कार्यान्वित करने में लग गए। क्रांति के लिए अन्य राजाओं को तैयार करने के लिए एक दिन तीर्थ यात्रा के बहाने नानासाहेब और अजीमुल्ला खा कुछ चुने हुए सैनिकों और सेवकों के साथ निकल पड़े। सर्वप्रथम वे पड़ोस के राज्य में गए। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का जन्म बिठूर में हुआ था। वह नाना साहेब की मुंह बोली छबीली बहन थी। साथ ही, झांसी राज्य भी अंग्रेजों की उसी राज्य हड़प नीति का शिकार हुआ था। उन्हें राजी करना अत्यंत सरल था। वहा से नानासाहेब लखनऊ पहुंचे। 


अवध के नवाब वाजिदअली शाह थे कोलकाता के पास मटियाबुर्ज में अंग्रेजी की कैद में पड़े हुए थे, लेकिन लखनऊ में उनकी बेगम हजरत महल थी। बेगम हजरतमहल तो अंग्रेजों से परेशान थी ही। उनके अवध राज्य को अंग्रेज हड़प चुके थे। उन्होंने प्राण पन से क्रांति में भाग लेना स्वीकार किया। मेरठ आदि से होते हुए नानासाहेब और अजीमुल्ला दिल्ली पहुंचे। बादशाह जफर बुढ़े हो चुके थे। उत्साह नहीं था। इन्हें बड़ी मुश्किल से राजी किया गया। क्रांति के तारीख 31 मई 1857 निश्चित हुई। यह तय हुआ कि अंग्रेजों सेना के भारतीय सैनिक विद्रोह कर दे। राजाओ और नवाबों की सेना मोर्चा संभाल ले।


बिठूर लौटकर क्रांति की योजना में और तेजी आई। नाना साहेब गुप्तचर साधू सन्यासियों फकीरों नट नटनियो के वेश में संपूर्ण उत्तर भारत में आजादी की अलख जगाते रहे। लाल कमल का फूल और चपातीयां घूमने और बटने लगी। नाना के हस्ताक्षरयुक्त पत्र घूमने लगा। गुप्तचर और हरकारों ने क्रांति का प्रचार इतनी तीव्रता से किया की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। अंग्रेजों की भारतीय सेना में सैनिकों को संगठित करने के लिए कमल प्रतीक के रूप में चुना गया। एक सैनिक बलिदान और क्रांति का प्रतीक लाल कमल लेकर किसी सेना में प्रवेश करता। सभी सैनिक बारी बारी से कमल की सुंदरता की प्रशंसा करते जिसका अर्थ क्रांति के लिए रक्त बहाने की प्रतिज्ञा होता था।


जनता को संगठित करने का काम रोटी के प्रति से लिया गया। एक व्यक्ति रोटी लेकर दूसरे गांव पहुंचता। उस गांव के सभी व्यक्ति उस रोटी को प्रसाद रूप में ग्रहण करते। उस गांव में रोटियां बनवाकर दूसरे गांव में भेजी जाती। रोटी और कमल ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अजीमुल्ला के निर्देश से नानासाहेब अंग्रेजों की आवभगत उसी तरह करते रहे जिससे अंग्रेजों के मन में उनके प्रति कोई शंका उत्पन्न नहीं हुई।



इतनी सुव्यवस्थित क्रांति भी निष्फल हो गई, जिसका कारण रहा मंगल पांडे के नेतृत्व में 10 मई को ही भड़क उठा विद्रोह।


मेरठ के बिजयी दिल्ली पहुंचे। दिल्ली में थोड़े समय के लिए बहादुर शाह जफर का शासन हुआ। मेरठ और दिल्ली के खबरें कानपुर भी पहुंची। कानपुर के अंग्रेज सेनापति हीलर ने नानासाहेब से अंग्रेजों की जानमाल की रक्षा के लिए कानपुर आने को कहां। अजीमुल्ला खा ने इस अवसर को हाथ से न जाने देने के लिए कहा। नाना साहेब अंगरक्षकों सैनिक के साथ कानपुर पहुंचे। अंग्रेजों ने सारा खजाना नानासाहेब को सौंप दिया 19 जून को कानपुर में भी अंग्रेजों का सफाया शुरू हो गया। 23 जून तक युद्ध हुआ। अंग्रेज हार गए। नाना साहेब का राज्य स्थापित हो गया। फिर भी अंग्रेजों से एक के बाद एक युद्ध हराते जाने के बाद नाना साहेब को कानपुर छोड़कर नेपाल की तराई की और चले जाना पड़ा।


प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के पीछे अजीमुल्ला खां का उर्वर मस्तिष्क था, जिसे क्रियान्वित करने का श्रेय नानासाहेब पेशवा को जाता है


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